साहित्य

आत्ममंथन – भीतर की झलक

अतुल पाठक

बीते दिनों की परछाइयाँ आईं सामने,
हर याद में बसी थी खुशी और दर्द का संगम।

मन के कमरे में खिड़कियाँ खोली मैंने,
जहाँ उजाला और अंधेरा साथ-साथ चलता रहा।

हर सवाल का उत्तर ढूँढा अंदर की गहराई में,
जहाँ छुपा था सन्नाटा, वहाँ जन्मा विश्वास का दीप।

गलतियाँ अब शिक्षा बनीं, ठोकरें बन गईं मार्गदर्शक,
और मैंने खुद को पाया, अपने ही भीतर की छाया में।

अब मैं शांत, अब मैं जागरूक,
हर पल मेरे भीतर की दुनिया बदल रही।

आत्ममंथन ने खोला मेरी आत्मा का रहस्य,
जहाँ प्रेम, धैर्य और शक्ति का मेल रहा।

अब डर नहीं, अब भ्रम नहीं,
हर अनुभव ने मुझे सच्चाई से जोड़ा।

खुद को जानना, खुद से मिलना, यही जीवन का लक्ष्य,
स्वयं की खोज में ही मिलता है सच्चा सुख और आनंद।

अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)

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