
अब तो मन की चुप्पी तोड़ो। राम नाम से नाता जोडों।।
शिवा धनुष है सिय को प्यारा। सिया राम का मिलन सहारा।।
परशुराम ने धनुष निहारा।क्रोध सहित बोले हुंकारा।।
जिसने धनुआ को है तोड़ा। परशुराम से नाता छोडा़।।
अलग बिलग हो अब संसारा। देगा कोई नहीं सहारा।।
लखन कहे सुन तात हमारे। प्रिय ही होंगे दास तुम्हारे।।
सुनत लखन के कटु अति वानी।परशुराम बोले अभिमानी।।
सुन रे बालक निपट अनाड़ी। जहर घुला तू बड़ा खिलाड़ी।।
परशु राम मन रूप समाया। राम नाम मन जगत लुभाया।।
देव रूप को मन में पारे। परशुराम नित धाम सिधारे।।
देख जनक मन खुशी समाए। देव गंधर्व गुणी जन गाएं।।
गाथा लिखते कविवर सारे। दास हुए हैं तुलसी न्यारे।।
परशु राम मन में हर्षाएँ। सियाराम के मन को भाएँ।।
छोड़ गए फिर बिप्र समाजा। राम बने फिर जग के राजा।।
जनक राज के मन को भाएंँ। राम चरित सब मिलकर गाएँ।।
अंत हुई सिय राम कहानी। लिखते तुलसी दास जुबानी।।
डॉ जगदीश नारायण गुप्त
“जगदीश”
बनारस✍️✍️




