साहित्य

चाहतों का सफर

शशि कांत श्रीवास्तव

कभी खत्म नहीं होता है –ये
चाहतों का सफर,
अनदेखे सपनों की चाहत
बचपन से जवानी तक
फिर बुढ़ापे से अंत तक,
अनवरत चलता रहता है
इस संसृति में –क्योंकि
ये है ,चाहतों का सफर,
जज्बातों का सफर
भावनाओं का सफर
जो लगाकर पँख उड़ता है,
ख्वाबों के आकाश में
करने को पूरे सपने अपने,
हाँ ,है ये चाहतों का सफर ||

शशि कांत श्रीवास्तव

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