
वीरांगना अजेय योद्धा रहीं,अपराजिता कहाती थी।
कवियों और कलाकारों को,सम्मान सहित बुलाती थी।
भारतीय नारी के हित में, किए अनेकों कार्य बड़े,
जनता की प्रिय रही अहिल्या,अतिशय आदर पाती थी।।
कुआंँ सरोवर धर्म स्थलों का,निज असंख्य निर्माण किया।
कला संस्कृति मूर्ति कला को,नूतन नव आयाम दिया।
अपने बल पौरुष से रानी, राज्य मालवा की समृद्ध,
नमन अहिल्याबाई को, आदर्शों से सीख लिया।।
एक बार जब राजकुंँवर के, रथ से बछड़ा कुचल मरा।
मृत्यु दंड रानी ने देकर,गौ माता का कष्ट हरा।
हाथ पैर सुत का बंँधवा कर उसी जगह पर भिजवाई,
हाथी पर सवार हो करके स्वयं कुचलनें जब पहुंँची,
गौ माता तब सम्मुख आई बचा लिया सुत पड़ा धरा।।
न्याय धर्म में ऐसी थी माता, नहीं किसी को भी छोड़ा।
कुशल शासिका बन करके सब,राज्यों से नाता जोड़ा।
चिंतन में गहराई अतिशय, सुयश क्षेत्र में पाई थी,
शिव जी की अप्रतिम भक्ति से,कभी न अपना मुख मोड़ा।।
हिंदू मंदिरों की निर्मात्री ,शिव की सच्ची भक्त रहीं।
नित टंकारें रही गूंँजती, ईश्वर में आसक्त रहीं।।
कलम बखान नहीं कर सकती,कीर्ति अहिल्या बाई की,
प्रतिमूर्ति सादगी छवि अनुपम,राष्ट्र प्रेम अनुरक्त रहीं।।
डॉ गीता पांडेय *अपराजिता*
रायबरेली उत्तर प्रदेश




