
अपना अर्थ जीवन का तलाश रही हूं । जीवन को खोजती उम्र को ढोती जा रही हूं।
व्यर्थ सोचती खुद से आत्म मंथन कर रही हूं। अतीत को अपने अब भूलती जा रही हूं।
सशक्त खुद को कर पाऊंगी यह सोच रही हूं। सेवा करना सत्य में जीवन बिता रही हूं।
अपने मन को सत्य विविधता में खोज रही हूं। पूर्व की प्राची से सीख कटुता को हर रही हूं ।
शर्त मेरी है मेरी ही भावना से यह पूछ रही हूं। अपने गंतव्य को पाने के लिए खुद से लड़ रही हूं ।
घट-भरता जा रहा गलतियों से कर पूछ रही हूं। कदमों की सही दिशा में मंजिल पा रही हूं।
खुद से खुद को माफ कर भगवान से कह रही हूं। बोझ अपना ढो कर अब कान्हा तुम्हें बुला रही हूं।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश




