
फिर न लौटेगा कभी मौसम सुहाना यह।
फिर न झूमेगा सरल बचपन दिवाना यह।।
याद आयेंगे मधुर दिन वो सुहाने से।
रात-दिन शैतानियाँ करना बहाने से।
अब कहां वो झगड़ना भोला जमाना यह।
फिर न लौटेगा कभी मौसम सुहाना यह…
काम कोई था नहीं बस मस्तियां करना।
वो मचलना रूठ कर मनमर्जियाँ करना।
जिद्दियों का जो हटीला सुगबुगाना यह।
फिर न लौटेगा कभी मौसम सुहाना यह…
सुखमिला अग्रवाल’भूमिजा’
©® स्वरचित मौलिक
मुंबई




