
ऊँची, ऊंची,
हाथी देह सी, पहाड़ियाँ
रात का धनधौर अँधेरा
और वह मासूम
भूख से बिलखता
मां की गोद में
मचलता, ज़ोर ज़ोर से
रो रहा है
वह भोली सी,
बेटे की भूख से त्रस्त
माँ, असहाय सी
उसी झोपड़ी के बाहर
ले आती है और
गीत गुनगुनाती
प्रयास करती है
जैसे तैसे वह सो जाय
कभी अपने स्तनों को
कोसती है जो
उसकी भूख को शांत नहीं
कर पाते है
तो कभी खड़ी खड़ी
थका हारा मांगू को
देखती है जो
भूख लगी तो
बची हुई रोटी का
टुकड़ा खा कर
सिरहाने सोया है
तो कभी रोती की तरह
दिखाई देता चांद को
निहारती है जो
अपना रौशनी से
सदियों से अंधेरे के श्राप में
जी रहे इस गाँव को
अपनी इसी रौशनी से
दिखाई देते हुए
थके हारे चेहरे
तो कभी जंगलों
जानवरों की हल्की सी
पहचान करा कर
सुरक्षित रखते हैं
पर आज यही
चांद जो किसी
रोती की तरह
दिखाई देता है
उसे चीड़ा रहा था
और उस असहाय
मां के दर्द को
बड़ा रहा था
पता नहीं न जाने कितनी
देर तक रोता रहा
वह मासूम
रो कर थक गया और
सो गया था
पर मां यूँ ही
खड़ी रही रात भर
आंगन में उसे कंधे पर
सुलाए हुए
डर था उसे
कहीं कंधे से नीचे
उतार सुलाने गई तो
फिर रोने लगा तो ,,,,,,
सारी रात इसी तरह
बीत गई
पता नहीं ऐसी कितनी
रात गुजरती है
इस गरीब, असहाय गांव में
मां की लोरी सुनाते हुए
बच्चों को कंधे पर
रखें
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश



