
लाचार सा खुद को पाती हूँ,
जब तेरे ज़ख्मों पर मरहम न लगा पाती हूँ,
तू दर्दों से लड़ता रहता है अकेला,
और मैं बस तुझे दूर से निहारती रह जाती हूँ।
तेरे बदन से गिरती पसीने की हर बूंद,
मेरी रूह को भीतर तक भिगो जाती है,
उन्हें अपनी अंजलि में भरकर माथे से लगाने की चाह,
बस चाह बनकर ही रह जाती है।
कहने को तो तेरे नाम कर दूँ
दुनिया की सारी खुशियाँ,
पर सच ये है — तेरे संग हर पल भी नहीं जी पाती हूँ,
तू संघर्षों में तपता रहता है हर रोज़,
और मैं चाहकर भी तेरे
साथ खड़ी नहीं हो पाती हूँ।
तृषा सिंह
देवघर झारखंड




