
भगत सुखदेव राजगुरु त्रय,भारतीय वीरों के हैं नाम।
हँसते हुए फाँसी पर झूले,क्रांतिकारियों ने दी जान।।
भारत की आजादी को है,तीनों वीरो ने मन में ठानी।
माँ भारती के वो अमर सपूत,वीर शहीद बलिदानी।।
भारत के हे! परम शूरवीरों,तुम्हें तो शत-शत प्रणाम।
भगत सुखदेव राजगुरु जी,तुझको बारम्बार प्रणाम।।
प्राणों की उच्च शहादत देकर,क्रांतिकारी करते रक्षा।
तेरे सर्वोच्च बलिदान से हरदम,भारत की है सुरक्षा।।
भारत देश की आजादी में,लाखों ने यह प्राण गंवाए।
ब्रिटिशों की गुलामी से भारत,को हैं आजाद कराए।।
गोरों का वह झंडा उतरा है,भारत का झंडा फहराए।
लोकतंत्र भारत की आन बान शान तिरंगा लहराए।।
संसद के द्वय सदनों-प्रांत के द्वय सदनों में है तिरंगा।
भारत सीमा-हर एम्बेसी,भारतीय गणराज्य तिरंगा।।
क्रांतिकारियों के बलिदान,शहादत से यह दिन पाए।
भगत सिंह सुखदेव राजगुरु,इत्यादि हैं क्रांति लाए।।
ध्यान रखो देशवासियों,बलिदान व्यर्थ न जाने पाएँ।
इसकी रक्षा-सुरक्षा-देशप्रेम,के अपना धर्म निभाएँ।।
जानी दुश्मन चाहे जितना,अपना कोई जोर लगाए।
सफल न होपाए निज मंसूबे में,वो रोज छटपटाए।।
भारतीय सीमा पर निश दिन,घुसपैठ तनाव बढ़ाए।
सैनिक वीर हमारे रक्षक,वे देश की सीमा के शान।।
दुश्मन से बदले लेते रहते,सदैव अपनी बंदूखे तान।
तुम्हीं पर प्रत्येक देशवासी,करें गर्व एवं अभिमान।।
राष्ट्र प्रेम त्याग बलिदान से,तिरंगे झंडे की तो शान।
हे!शूरवीर राष्ट्रप्रेमी-देशभक्त,तू सबसे बड़ा महान।।
शत-शत नमन तुम्हें वीरों,कोटि-कोटि मेरा प्रणाम।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के,तुम्हीं गौरव-शान।।
निष्ठुर अंग्रेजों से लोहा लेते,लेते देश प्रेम में कुर्बान।
तेरे बल बूते से गुलामी के,बेड़ी से मुक्त हिंदुस्तान।।
आर्यावर्त स्वराष्ट्र हिंदुस्तान,कहो भारत यह महान।
विश्व में डंका बाजे शांति प्रिय,माने सकल जहान।।
प्राणों की शहादत देते रहे,वे लड़ते रहे हिंदुस्तानी।
फूट डाल वो शासन करते हैं,भगाए तूने ब्रितानी।।
जलिया वाला बाग याद है,भूली नहीं वह कहानी।
जन.डायर की गोलियों से,रक्त रंजित ये जवानी।।
देश एवं दुनिया में तिरंगा,यूँ ही फहरे और लहराए।
भारत माँ के चरणों में,सब देशप्रेमी शीश झुकाए।।
युगों-युगों तक स्मृति में रहेगा,वीरों के ये बलिदान।
हे!क्रांतिवीर शूर्माओं सेनानियों,तेरा सदा सम्मान।।
राजगुरु सुखदेव भगत,हमारे दिलों के हैं यह हीरो।
23मार्च शहीद दिवस पर शत शत नमन है वीरों।।
श्रद्धा पुष्प समर्पित आप,त्रय को कोटिशः प्रणाम।
बारम्बार वंदन अभिनन्दन,शत-शत दिली प्रणाम।।
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रचयिता :
*ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.
(शिक्षक,कवि,लेखक,समीक्षक एवं वरिष्ठ समाजसेवी)




