
मुझे फ़िल्टर वाली चमक नहीं भाती,
मुझे तो धुंधली तस्वीरें पसंद हैं।
जहाँ दिखावा कम और सच्चाई ज़्यादा हो,
मुझे वही लम्हे पसंद हैं।
फिल्टर में अक्सर चेहरा बदल जाता है,
पर धुंधलापन सच को छुपाता नहीं।
थोड़ी सी अधूरी, थोड़ी सी सादी,
पर अपना रूप कभी बदलता नहीं।
धुंधली तस्वीरों में एक सादगी होती है,
जैसे यादों का कोई कोमल सा रंग।
उनमें बनावट कम और अपनापन ज़्यादा,
जैसे मन की खामोश तरंग।
मुझे चमकती हुई झूठी दुनिया नहीं,
सादगी की वो झलक पसंद है।
इसलिए फ़िल्टर से सजी तस्वीर नहीं,
मुझे धुंधली तस्वीरें ही पसंद हैं।
मौलिक/स्वरचित
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)




