साहित्य

दर्द की छाया

सुषमा श्रीवास्तव

 

दर्द की छाया चेहरे पर आ ही जाती है।
दिल कितना भी छुपाना चाहे, आँखें कह ही देतीं हैं।
अधरों की मुस्कान में भी नमी आ ही जाती है।
दर्द पीने की कला चलते-चलते, जीना सिखा ही जाती है।
आसाँ नहीं हैं कड़वे घूंँटों को पीना,
पर पी-पीकर इनको, मिठास याद नहीं रहती।
यही अनुभव हम अक्सर साझा करते हैं,
बातों ही बातों में जीवन का संदेश देते हैं।
अनजाने में ही सही वो राहें चमका ही जाते हैं।
सरेआम अनुभवी का तमगा पहना ही जाते हैं।

सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक भाव, ©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर,उत्तराखंड।

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