
छुटका नेता विधायक बनने का सपना पाले थे। सबसे पहले समाज सेवा करना अनिवार्य तत्व है। नेताजी गरीब से गरीब के घर नतमस्तक होने लगे। गरीबों के घर सूखी रोटी ठंडा पानी पी कर रात गुजारनी शुरू कर दी। नेताजी बहुत होनहार आदमी थे।
किसी के घर बैठने के लिए टूटी खटिया भी नहीं मिलती तो जमीन पर ही बैठ जाते थे। नेताजी के कुर्ता पायजामा में मिट्टी लग जाती तो झाड़ते नहीं थे। इस तरह की दरियादिली देखकर आम जनता नेताजी के करीब होने लगी। नेताजी जनता का समर्थन पाकर गदगद होने लगे।
सुंदरिया के लड़के की मौत के बाद खुद को सुंदरिया का बेटा घोषित कर दिया। सुंदरिया के घर की सभी जिम्मेदारी उठा ली। हर विपदा में लाठी लेकर खड़ा रहता। यहाँ तक बच्चे, बूढ़े, जवान, सभी महिलायें उसको अपना नेता मान लिये।
नेताजी घर-घर, जन-जन तक पहुँच कर लोगों के लिए समस्त जीवन समर्पित कर दिया। ऐसा कर्मठ नेता, यहाँ तक गरीब बच्चों की फीस तक जमा कर देते थे। ऐसा विकास करूँगा। लोग याद करेंगे। घर-घर विकास की गंगा बहेगी। कहीं जाते सुंदरिया के घर जरूर नेताजी का काफिला रुकता।
जनता का ह्रदय मीठी-मीठी बातों से जीत लिया। चुनाव में नेताजी ने परचम लहरा दिया। सुंदरिया ने खूब नारे लगाया कि मेरा मुंहबोला बेटा जीत गया। सुंदरिया को भरोसा था जितने के बाद मेरा बेटा जरूर मिलने आयेगा।
जीत के जश्न में पगलाये नेताजी का काफिला सुंदरिया के घर के बगल से निकल गया। रुका नहीं। नेताजी का ठाठ बाट, विधायकी का रुतबा के आगे आम जनता तथा सब कुछ वादे भूल गये।
सुंदरिया राह तकती रही कि मेरा मुंहबोला बेटा जरूर आयेगा। धीरे-धीरे पांच साल गुजर गये। नेताजी अगले चुनाव की तैयारी के लिये, सुंदरिया की याद आ गयी। जैसे ही काफिला सुंदरिया के घर रुका। नेताजी देखे कि भीड़ लगी है।
पता चला वह अपने मुंहबोला बेटा से मिलना चाह रही थी। बेटा के न आने पर सुंदरिया ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। छुटका नेता से बने विधायकजी अपने चमचों से बोले.. एक अपना वोट कम हो गया रे। और काफिला आगे बढ़ गया।
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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज




