साहित्य

ग़ज़ल

वाई. वेद प्रकाश

झूठ बदल दो,सांच बदल दो।
जवां दिलों की आंच बदल दो।
शीशों के घर में भी रहकर तुम,
दिखे नहीं कुछ कांच बदल दो।
सिंहासन पर चढ़ा दुर्योधन बोले,
पाण्डु कथा के पांच बदल दो।
सब करते क्या खेल – तमाशा,
इधर- उधर का नांच बदल दो।
किस पर क्या इल्ज़ाम लगाना,
तुम चाहो तो जांच बदल दो।

वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890

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