साहित्य

नारी शक्ति: मनहरण घनाक्षरी

पूर्णिमा सुमन

बेटी बन लाड लड़ा, आंगन महकाती वही, सहनशीलता की मानो, मूरत अनूप है।

पत्नी बन साथ दे जो, सुख और दुख में भी, त्याग और निष्ठा का ही, पावन स्वरूप है।

शील की है खानि वह, मान की निशानी वह, त्याग की कहानी वह, ममता की धार है।

कोमल है काया किंतु, लोहे सा इरादा उसका, सृष्टि की विधात्री वह, जग का आधार है।

आए जब आंच कोई, लाज पे समाज की तो, बनती भवानी वही, शक्ति का नवरूप है।।

माता बन गोद में वो, संस्कार सींचती है, छाया बन शीतल है, कष्ट में वो धूप है।

मर्यादा की रेखा जो भी, लांघने का यत्न करे, चंडी बन करती वो, पाप का संहार है।

सौम्य रूप धारिणी है, प्रेम का प्रतीक वही, किंतु जब जागती है, ज्वाला बन जाती है।

दुष्ट दलन को हाथ, खड्ग वो उठाती जब, काल भी डरे जो रूप, विकराल पाती है।।

मर्यादा की रक्षा हेतु, प्राण वार देने वाली, वीरांगना बन वह,जगत् प्रसिद्ध है।

धैर्य की प्रतिमूर्ति वो, शक्ति की पुंज दिव्य, अंबर के माथे पर,चमकती नूर है।

नारी के हर रूप में, जग का होता कल्याण , ईश्वर की रचना का, सबसे श्रेष्ठ रूप है।।

पूर्णिमा सुमन

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!