
शहर की झुलसन से छिपकर,
उलझनों के जाल से निकलकर,
भागमभाग की इस दौर में,
चलो शहर से दूर चलें,
चलो गाँव की ओर चलें।
जहाँ सुबहोशाम की हवा मिले,
बगिया में अनगिन फूल खिलें।
माटी की सोंधी खुशबू उठे,
अंतः में दरिया सी लहर उठे,
वृक्षों पर खगकुल का कलरव हो,
घर में इक आँगन हो,
आँगन में चरपइया हो।
खुला आसमान ऊपर हो,
साथ में ‘शेरू’ पूसी हों।
आँखों में नींद का नाम न हो
कल्पना के अश्व भागें-दौड़ें,
उन पर सवार मन मेरा हो,
साथ न कोई झमेला हो।
लेखनी की चादर फैली हो, पाठकों का बसेरा हो।
समीक्षाओं की बौछार पड़े,
चित्त से तृप्ति की धूम उठे।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक कृति,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर,उत्तराखंड।




