साहित्य

गजल मुस्कुराना सीखना है

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

ग़मों में भी सभी को मुस्कुराना सीखना है,
ज़माने को सदा दिल से हँसाना सीखना है।

अगर किस्मत कभी हमको रुलाना चाहती है,
तो आँसू पी के फिर खुद को मनाना सीखना है।

कभी हालात बन जाएँ अगर ग़म का बहाना,
तो हिम्मत से नया रस्ता बनाना सीखना है।

न हो व्यवहार में हर बात थोड़ी बचकाना,
हमें जीवन का सच्चा फ़र्ज़ निभाना सीखना है।

जहाँ नफ़रत की आँधी हो, वहाँ प्रेम का तराना,
हमें दुनिया को मिल-जुल कर सुनाना सीखना है।

‘सुमन’ जीवन की राहों में न करना दिल दिवाना,
हर इक हालात में हँसकर बिताना सीखना है।

प्रकृति से छेड़छाड़

प्रकृति का अपना नियम है, उसे वैसे ही रहने दो।
जीवन का हर चक्र है इसमें, इसे न यूँ तुम सहने दो।

धरती माँ की गोद सजी है, हरियाली के गहनों से,
लोभ मोह में आकर इसको, मत बाँटो तुम दहनों से।

हरी-भरी सब्ज़ियों में जब, रसायन घुल जाता है।
स्वाद नहीं, बस रोग नया फिर, जीवन में भर जाता है।

मुरझाए फूलों की खुशबू, कीटनाशक से खो जाती।
सौंदर्य की झूठी चाहत में, प्रकृति पीड़ा सह जाती।

घुटती साँसें, धुआँ गगन में, जब-जब हम फैलाते हैं।
निर्मल वायु के उपवन को, खुद ही हम जलाते हैं।

मिट्टी, जल, आकाश बचाओ, यही प्रकृति का लाभ है।
इससे ही जीवन महकेगा, इसमें ही सबका भाव है।

पेड़-पौधे संतानों जैसे, इनको मत तुम काटो यार,
हरियाली से ही सजेगा, जीवन का सुंदर संसार।

छेड़छाड़ जब कम होगी तो, सुख का दीप जलेगा फिर,
प्रकृति संग जो प्रेम करेगा, जीवन उसका फलेगा फिर।

प्रकृति का मान रखोगे तो, खुशहाली घर आएगी।
नदियों की निर्मल धारा फिर, मधुर गीत सुनाएगी।

लाभ इसी में छिपा हुआ है, संतुलन को रहने दो।
माता समान इस प्रकृति से, छेड़छाड़ अब रहने दो।

डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार

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