
आई फिर ग्रीष्म ऋतु
धूप में ना निकल तूं
जल रहा है तन मन
बारिश होनी चाहिए।
बाल, वृद्ध, नारी नर
गरमी से लथपथ
आम रस शरबत पीकर
दिन बितानी चाहिए।
ग्रीष्म ऋतु की गर्मी में
चिलचिलाती धूप में
सूरज आग उगल रही
छाता लेकर कहीं जाइए।
सहकर गरमी बेचारा
सूख रहे पेड़ पौधे सारा
पानी का इंतजाम करके
दो चार वृक्ष को लगाइए।
सड़कें सूनी हो रही
धूप से तपे दोपहरी
भीषण गर्मी में पानी
सबको पिलाइए।
हे भगवान करो कल्याण
जिससे कम हो तापमान
सबमें नई ऊर्जा लाकर
तपन को घटाइए।।
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ममता झा मेधा
डाल्टेनगंज



