हिंदी साहित्य का इतिहास- रीति काल के कवि विषयक ऑनलाइन संगोष्ठी सम्पन्न

वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी, प्रयागराज, उ.प्र. के तत्वावधान में 14वीं राष्ट्रीय संगोष्ठी (ऑनलाइन) का आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इसमें “हिंदी साहित्य का इतिहास (रीतिकाल के कवि)” विषय पर चुनिंदा वक्ताओं ने विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया तथा उपस्थित सभी सुधी साहित्य मनीषियों ने भी अपने विचार रखे। इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न भागों से साहित्यप्रेमियों एवं विद्वानों की सहभागिता रही। सर्वप्रथम आदरणीया नेहा शर्मा ने सुमधुर स्वर में सरस्वती वंदन प्रस्तुत किया, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया। तत्पश्चात् मंच के संस्थापक अध्यक्ष डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुजन’ के कुशल संचालन में संगोष्ठी की कार्यवाही प्रारंभ हुई। संस्था की संरक्षक आदरणीया विनीता निर्झर ने अपने स्वागत-उद्बोधन के द्वारा सभी अतिथियों, वक्ताओं, श्रोताओं तथा संचालक मंडल के सदस्यों का स्वागत किया। डॉ गुप्ता ने आज के विषय पर प्रकाश डालते हुए प्रथम वक्ता आदरणीया अंकिता जैन ‘अवनी’ को आमंत्रित किया। उन्होने रीति काल के कवियों के कृतित्व तथा व्यक्तित्व के बारे में विस्तारपूर्वक व्याख्यान दिया। उन्होने रीति काल नाम क्यों पड़ा इसके बारे में भी बताया। उसके बाद द्वितीय वक्ता आदरणीया क्षमा पाण्डेय (मंच की सलाहकार) ने रीति काल के समस्त कवियों की रचनाों की विशिष्टताओं पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हुए इसके कला पक्ष तथा भाव पक्ष को उजागर किया। तत्पश्चात् आयोजक संस्था/ समूह “वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी” के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ ने कार्यक्रम का समीक्षात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए बताया कि वि.सं. 1700 से 1900 (सन् 1643 से 1843) तक का 200 वर्षों का कालखंड रीतिकाल के अंतर्गत आता है, जिसे कुछ विद्वान सन् 1650 से 1857 तक मानते हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मुगल सम्राट शाहजहां से लेकर लार्ड हार्डिंग के शासन काल तक के साहित्य को रीति काल के अंतर्गत अध्ययन किया जाता है। कार्यक्रम की विशिष्टता, विविधता तथा उपयोगिता के बारे में बताया। इसके बाद अन्य उपस्थित साहित्य-साधकगण आ. विजय, नारायण, आ. छाया ‘सख्य’, आ. नेहा शर्मा, आ. शशि गुप्ता इत्यादि ने कार्यक्रम तथा विषय पर अपने विचार रखे।
इसके बाद व्यवस्थापक आदरणीय दुर्गादत्ता मिश्र ‘बाबा’ ने संगोष्ठी में उपस्थित सभी वक्ताओं तथा श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने सभी वक्ताओं, अतिथियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’ का धन्यवाद किया। अंत में संस्थापक अध्यक्ष ने कार्यक्रम की औपचारिक समाप्ति की घोषणा की। इस प्रकार यह ऑनलाइन आभासी संगोष्ठी सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। प्रत्येक माह में आयोजित यह कार्यक्रम हिंदी साहित्य के इतिहास को जानने की दिशा में अभिनव प्रयोग सिद्ध हो रहा है।
-डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
संस्थापक अध्यक्ष-वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी, प्रयागराज, उ०प्र०



