
ब्रह्मचारिणी मातु का , दूजा है अवतार।
हाँथ कमण्डल मातु के, करती बेड़ा पार।।
चाह थी महादेव की, करती थीं शिवभक्ति।
निर्जल तप वन में किया, मन में ले शिव शक्ति।।
जप कर माँ के नाम को, दूर करो अज्ञान
द्वेष मुक्त संसार हो, सबका हो सम्मान ।।
दुःख मुक्त हर भक्त हो, सुखी रहे हर जीव।
पूर्ण विश्व कल्याण हो, माँ की कृपा अतीव II
माता धारे अक्ष की, माला दाएं हाथ I
और कमण्डल बाम में, हरपल रखती साथ II
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तप-संयम संघर्षरत, शिव के प्रति आसक्त I
पूरे श्रद्धा भाव से, पूजें सारे भक्त।।
अर्पना मिश्रा
उन्नाव उ. प्र.




