
सोनू चलो आज तुम्हें मैं अपनी माँ से मिलवाता हूँ।
आपकी माँ तो मेरी दादी लगेगी ना पापा? छोटे से सोनू ने अपने पिता से पूछा।
हाँ,वो तुम्हारी दादीजी हैं और वो तुमसे मिलकर कितनी खुश होंगी देखना।
रास्ते भर गौरव सोचता जा रहा था, पोते को देखकर जरूर माँ का मन पिघलेगा।शायद पोते के साथ- साथ मां हमें भी अपना ले।
गौरव जैसे ही घर पहुँचा वहाँ का गमगीन माहौल देखकर अचंभित हो गया।
तेज- तेज कदमों से अंदर की ओर बढ़ रहा था।
उसे देखते ही वहाँ लोगों की जमा भीड़ में काना – फूसी शुरू हो गई।
अरे देखो सरला का बड़ा बेटा आया है।
अरे ये तो बीमार माँ को देखने तक नहीं आया। सौतेला बेटा जो ठहरा ।
मैंने तो ये भी सुना है कि ये बहुत अमीर है।
जब माँ को ऐसे नालायक भाई के भरोसे छोड़ दिया,तो ऐसी अमीरी किस काम की?
नहीं -नहीं ! सरला और सरला के सगे बेटे ने इसपर झूठा इल्जाम लगा कर इसे घर से निकाल दिया था।
हाँ, हाँ, मैंने तो सुना है पिता की संपत्ति से भी इसे बेदखल कर दिया है।
जितने लोग ,उतनी तरह की चर्चा हो रही थी।
लेकिन गौरव को किसी भी बात से कोई फर्क नहीं पड़ा।सिवाय इसके कि -अरे ये तो बीमार माँ को देखने तक नहीं आया।
यह सुनकर तो उसका कलेजा फट पड़ा था।
आँगन में माँ को अंतिम शैय्या पर देख वह अपने आप को रोक नहीं पाया।उसकी आत्मा तक चित्कार कर उठी।
माँ काश !……….. आपने एक बार मुझे अपना समझा होता।अपनी बीमारी की खबर भेजकर तो देखा होता आपने। मैं सब कुछ भूलकर आपके पास दौड़ा चला आता।
काश………
काश………
गौरव आज माँ से बहुत सारे काश के जवाब माँगना चाह रहा था।
फिर भी सीने में दर्द लिए हुए आगे बढ़कर बगल में रखे फूलों में से सोनू की अंजुरी में फूल भरे और खुद भी अंजुरी भर फूल उठाए,और माँ के चरणों में सोनू से फूल चढ़वाए और खुद भी अंजुरी के फूल मांँ को समर्पित करते हुए माँ चरणों से लिपट कर रोने लगा।
जब वहाँ से लौटने लगा तो सोनू ने कहा ,पापा हमें दादी से मिलना है ना।
गौरव ने कहा,बेटा दादी से मिलने में हमसे बहुत देर हो गई ।
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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