साहित्य

कहते है जिसे ज़िंदगी

सुरभि

कहते है जिसे ज़िंदगी
करीब से देखा है मैने उसे
करीब से जाना है मैने उसे
कभी मुठ्ठी में बंद कर लिया
कभी पलकों में छिपा लिया
कहते है जिसे ज़िंदगी
मासूम सी परी है
कोमल सा फूल है
कभी वर्षा सहती है
कभी खुशबू से सराबोर रहती है
कहते है जिसे ज़िंदगी
गम की परछाईयों में भी
मुस्कुराती है
तूफानों में भी चलती रहती है
दर्द भी सहती है
दवा भी पीती है
कहते है जिसे ज़िंदगी
कुछ कहती नही
कुछ बोलती नही
हर क्षण रंग बदलती है
हर वक्त मिज़ाज बदलती है
कहते है जिसे ज़िंदगी

सुरभि
इंदौर मध्यप्रदेश

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