
आज़ाद परिंदे थे हम सब,
नीला गगन मुट्ठी में भर लेते थे।
सपनों की कोई सरहद न थी,
पाँवों में बंधन कब रहते थे।
धूप हमें सहेली लगती,
बरसात खेल बन जाती थी।
कागज़ की छोटी-सी नावों पर
दुनिया समंदर हो जाती थी।
गली के मोड़ पे बैठी हँसी
अपनी सच्ची पहचान थी,
रूठना बस इक पल भर का,
मनाना ही अपनी शान थी।
मिट्टी सने उन हाथों में
चाँद पकड़ने की ज़िद रहती,
छोटी-सी जेब में जाने कैसे
पूरी दुनिया सिमटती रहती।
न हार का डर, न जीत का घमंड,
हर दिन बस उत्सव लगता था,
खेल-खिलौनों की उस नगरी में
जीवन ही मेला लगता था।
होली का रंगीला हुड़दंग,
दीवाली की उजली रात,
दशहरे पर रावण दहन,
माँ दुर्गा का पावन विग्रह-विसर्जन साथ।
मेले में खोकर भी हँसते,
चूरन-गोलियाँ खाते थे,
जेबों में कंचे खनकाते,
खुद को राजा बताते थे।
छत पर चढ़ पतंग लूटना
सबसे बड़ी बहादुरी थी,
अम्मा की डाँट से बच जाना
अपनी अनोखी चतुराई थी।
दीवारों पर चाक से लिखना
दोस्ती की गुप्त कहानी,
पकड़म-पकड़ाई की दौड़ में
उड़ती जाती थी नादानी।
वो शैतानी भी क्या शैतानी—
जिसमें बस हँसी का राज था,
न छल-कपट की परछाईं,
मासूमियत का ही ताज था।
आज भी जब मन थक जाता,
यादों में वो टोली गाती है,
भीतर बैठा नन्हा पंछी
फिर पंख नए फैलाता है।
धीरे से आकर कानों में
एक संदेश सुना जाता है—
“चल, एक बार फिर से जी लें,
वैसे ही आज़ाद उड़ जाते हैं।”
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




