साहित्य

कलह

बेख़ौफ़ शायर डा. नरेश सागर

कलह बढ़ी तकरार हो गई।
बेमतलब की रार हो गई।।

गुस्से में जो निकला मुख से।
बात वही तलवार हो गई।।

तू तू – मैं मैं बढी कलह से।
शांति फिर बेजार हो गई।।

रिश्ते टूटे – टूट गये घर।
घर में खड़ी दीवार हो गई।।

हासिल तो कुछ हुआ नहीं पर।
संबंधों की हार हो गई।।

चूल्हा खूब उदास हो गया।
रोटी भी बेजार हो गई।।

सबने देखा खूब तमाशा।
कलह जब उतार हो गई।।

इससे बचकर रहना सीखो।
मत सोचो की हार हो गई।।

“सागर” ये बन आती होनी।
और कहती खुद्दार हो गई।।
..……
मूल रचनाकार-
बेख़ौफ़ शायर डा. नरेश सागर
गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज
Email…. nsnareshsagar1@gmail.com

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