
सर्द के दरमियां ये जो कम्बल है ,
ये तो शीत इलाकों का सम्बल है
उफ ये ठिठुरती फिजायें !!
कंपकपाती सर्द घटाएं !!
कहीं निमोनिया ,बारिश, बर्फ़ओले ,
लगता है फिर से रूठे हैं भोले ।
निर्धन जन तो बस यूं ही,
अनवरत टकटकी लगाकर ,
ठिठुरती सदा को हलक में छुपाकर ,
देखते भीगते आसमाँ को ,
बस यूं ही निरता निरता कर ,
ठिठुरन में धूप की उम्मीद जगाकर ।
और फिर ओढ़ लेते खामोशी ,,
मैली कुचैली फ़टी चादर को
अपना कम्बल मानकर !!
जीर्ण शीर्ण काया को ,
उसी अपने ,कम्बल ,से लिपटाकर ,
लरजते होठों और पथराते कपोलों को
कुछ यूँ ही सिमटाकर !!
मन ही मन कर लेते बस ,
एक अनकही अनसुनी गुहार।
हे !सूर्य देव हे !अग्नि देव!!
प्रभु दया दृग खोलो !!
,कम्बल ,में अब ऊष्मा नही !
पतीले में अब दाना नही !
भेज दो किसी अमीर को ,
भूख और ठिठुरन हरने ,
कम्बल, कैमरा व चावल के साथ ।
उसे शोहरत नसीब हो ,
और मुझे थोड़ा सा जीवन !!
या प्रभु! स्वयं बिखर जाओ,
ढक लो धरा को ऊष्मा बनकर ,
एक प्राकृतिक अमूल्य कम्बल से,
हर लो यातनाएं अटूट सम्बल से ।
सुषमा दीक्षित शुक्ला




