
बहुत रिश्ते टूटे हैं
धागों कि तरह ,
रहती हैं बहुत सी समस्या
पर कोई हल नहीं,
मैने तो इतना समझा है,
कोई नहीं अपना है।
कोई नहीं अपना है।
सिर्फ दिखावे की दुनिया ओर उसमें फसे हम,
जो करना तो बहुत कुछ चाहते पर कर पाते नहीं ,
किसी पे भरोसा कर के खुद को डूबा पाते हैं,
फिर अफसोस क्यों मनाए ।
इसलिए में कहती हु ,
कोई नहीं अपना है।
कोई नहीं अपना है।
बस है तो ये झरने मेरे,
बस है तो ये पहाड़ मेरे,
बस है तो ये फुल मेरे ,
बस है तो ये समुद्र मेरे,
जिन ने मुझे कभी रोक नहीं ।
कभी किसी चीज के लिए टोका नहीं ।
कुछ कहूं तो सब सुन जाते है,
कुछ कहूं तो सब सुन जाते है,
बिना किसी सवाल के ,
बिना किसी बात के,
बस ,
मैने तो इतना समझा है,
कोई नहीं अपना है।
कोई नहीं अपना है।
– रिया राणावत
कालीदेवी, झाबुआ (माध्य प्रदेश)




