साहित्य

कुल्हाड़ी रोक लो भाई!

कवयित्री ज्योती वर्णवाल

सुनो लकड़हारे भैया, तनिक रुको तो सही,
नीचे रखो अपनी कुल्हाड़ी, आगे बढ़ो नहीं।

बच्चों ने संकल्प लिया है, पेड़ों को बचाएंगे,
इन हरी-भरी डालियों को, हम कटने न देंगे।

ज़रा तनिक तो सोचो भैया, पेड़ नहीं तो बारिश कहाँ?
सूखी धरती तड़पेगी फिर, हरियाली सजेगी कहाँ?

पंछी कहाँ बनाएंगे घोंसला? राही कहाँ सुस्ताएंगे?
बिन ऑक्सीजन के हम सब, साँसों की कमी पाएंगे।

यह उपवन है, जीवन है, यह स्वर्ण समान धरोहर है,
इसे काटकर मत खेलो, यह विनाश का मंज़र है।

कभी नीम, कभी आम की छाया, हमको सुख पहुँचाती है,
इनके मीठे रसीले फल, हर भूख मिटाती है।

देखो गिलहरी कैसे फुदकती, कैसे प्यार जताती है,
गाँव के मुखिया की चौपाल, इसी छाँव में सजती है।

यह पेड़ हमारी पूँजी है, इसे यूँ ही मत खोना,
कुल्हाड़ी छोड़ो भैया, अब और न बीज बोना।

पेड़ बचेंगे तो हम बचेंगे, खुशहाली फिर नाचेगी,
वरना आने वाली पीढ़ी, बस धूल और धूप ही फाँकेगी।

जन्मदिवस पर पाँच पेड़, लगाने का संकल्प करो,
अपनी धरती माँ की गोद, हरियाली से अब भरो।

कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)

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