साहित्य

लघु कहानी- सपनों का संसार

डॉ ऋतु अग्रवाल

लघु कहानी- सपनों का संसार

“बेटा! तू जिससंसार की बात कर रही है, जरूरी नहीं उसे बसाने में लोग तेरी मदद करें। मदद तो छोड़ समर्थन भी कर दें तो भी बड़ी बात है।” पूनम किसी भी हाल में पूर्वी को इस दुनिया की तकलीफों एवं मुश्किलों से बचाना चाहती थीं।
“मम्मी! हर कार्य का प्रथम बार विरोध ही होता है पर धीरे-धीरे लोग उसे् बारे में विरोध करना छोड़ देते हैं और अंततः मौन स्वीकृति दे ही देते हैं और मम्मी एक बात बताइए कि हम कोई गलत कार्य तो नहीं कर रहे फिर भला समाज की दकियानूसी सोच एवं वर्जनाओं से क्यों डरें?” पूर्वी अपने निश्चय पर दृढ़ थी।
जब से पूर्वी ममेरे भाई और भाभी की मृत्यु हुई थी, पूर्वी बहुत उदास रहने लगी थी। पूर्वी के ममेरे भाई एवं भाभी पूर्वी को बहुत मानते थे क्योंकि उनकी अपनी कोई सगी बहन नहीं थी और क्योंकि पूर्वी का ननिहाल उसके घर के बहुत नज़दीक था तो पूर्वी अक्सर वहाँ आया-जाया करती थी और अपनी ममेरी भाभी से उसकी दाँत काटी दोस्ती हो गई थी।
पूर्वी के भैया-भाभी रात को एक वैवाहिक समारोह से लौट रहे थे कि तेज रफ्तार कार ने उनकी मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी और मौके पर ही दोनों की मृत्यु हो गई। उनकी जुड़वां बच्चियाँ सिर्फ छह माह की थीं और पूर्वी की मामी को उनका पालन-पोषण करने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। यथासंभव पूर्वी, पूनम और अन्य रिश्तेदार सहयोग कर रहे थे पर किसी के लिए भी यह संभव नहीं था कि पूर्वी के ननिहाल में रहकर उन बच्चियों की परवरिश कर सकें।
भाई-भाभी और बच्चियों के प्रति लगाव के कारण पूर्वी ने उन बच्चों को गोद लेने का निश्चय किया था ताकि कानूनी अधिकार होने के कारण बाद कोई भी बच्चों पर अपना हक एवं प्रभुत्व न जमा सके जिसका पूर्ण विरोध पूर्वी की ददिहाल से जुड़े लोग कर रहे थे। उनका मानना था कि ऐसी स्थिति में पूर्वी के विवाह में अड़चन आएगी और हर जगह पूर्वी का नाम ही उन बच्चों की माँ के तौर पर अंकित होगा तो किस-किस को पूरी कहानी सुनाएँगे। कुंवारी माँ का टैग लगने के कारण परिवार की बदनामी होगी हो अलग।
पूनम को एक तरफ पूर्वी और बच्चियों की चिंता थी तो एक तरफ परिवार और समाज की पर पूर्वी कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थी। इसी संदर्भ में सब लोग विचार-विमर्श कर रहे थे।बच्चों के ननिहाल से भी सबको बुलाया गया था ताकि बाद में कोई आपत्ति न कर सके। पूर्वी के ननिहाल एवं उसकी भाभी के मायके वाले जहाँ पूर्वी के हौंसले को देखकर सतब्ध थे वहीं पूर्वी के दादा पक्ष एवं पड़ोसी पूर्वी के इस फैसले की भर्त्सना कर रहे थे।
“यदि आप सब लोग अनुमति दें तो मैं पूर्वी से विवाह करना चाहता हूँ मैं पूर्वी के हौंसले की दाद देता हूँ और अपनी भांजियों के प्रति मैं भी अपना दायित्व निभाकर अपनी बहन और जीजा जी को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहता हूँ। यदि आप सभी और पूर्वी की अनुमति हो तो मैं पूर्वी के जीवनसाथी एवं कीर्ति-नीति के पिता की जिम्मेदारी उठाना चाहता हूँ।” कीर्ति-नीति के छोटे मामा सौरभ ने अपने हाथ जोड़ते हुए कहा।
आँखों ही आखों में सहमति हुई। पूरे परिवार ने करतल ध्वनि से पूर्वी और सौरभ का समर्थन किया। अगले माह अदालत में पूर्वी एवं सौरभ के विवाह एवं बच्चों को कानूनन गोद लेने की प्रक्रिया पूर्ण हुई। देखते ही देखते सपनों का वह संसार बसा जिसकी किसी ने स्वप्न में भी आशा नहीं की थी।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश

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