
मनुष्य का जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों का क्रम नहीं है, बल्कि वह आत्मा की उस यात्रा का भी प्रतीक है जो धीरे-धीरे संसार की चकाचौंध से उठकर ईश्वर के प्रकाश की ओर बढ़ती है। जन्म लेते ही मनुष्य इस जगत के आकर्षणों में उलझ जाता है,धन, मान, प्रतिष्ठा और भोग की लालसाएँ उसे निरंतर व्यस्त रखती हैं। यही संसार का वैभव है, जो बाहर से बहुत चमकदार प्रतीत होता है, पर भीतर कहीं न कहीं एक रिक्तता छोड़ देता है।
जब मनुष्य जीवन के उतार-चढ़ाव देखता है, सुख-दुःख के अनुभवों से गुजरता है, तब उसके भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है,क्या यही जीवन का अंतिम लक्ष्य है? यही प्रश्न उसे संसार से ईश्वर की ओर मोड़ने लगता है।
माया के बाजार में,
जग करता व्यवहार।
मन का प्यासा पंथ फिर,
खोजे सत्य अपार॥
संसार की चमक क्षणभंगुर है। जो आज है वह कल नहीं रहेगा। इसी सत्य का बोध धीरे-धीरे मनुष्य को भीतर की ओर ले जाता है। वह समझने लगता है कि असली शांति बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने में है।
यही वह क्षण है जब मनुष्य की यात्रा देह से देवालय की ओर आरम्भ होती है। पहले वह बाहरी मंदिरों में जाता है, फिर धीरे-धीरे अनुभव करता है कि सच्चा देवालय तो उसके अपने अंतःकरण में ही स्थित है।
भटके पथ संसार में,
मन पाया संताप।
देवालय की राह से,
मिटता भीतर ताप॥
ईश्वर का वैभव संसार के वैभव से भिन्न है। संसार का वैभव बाहरी है, जबकि ईश्वर का वैभव आंतरिक प्रकाश है। जब मनुष्य भक्ति, सत्य, करुणा और सेवा को अपने जीवन में स्थान देता है, तब उसके भीतर का देवालय प्रकाशित हो उठता है।
मन मंदिर में दीप जब,
श्रद्धा से जल जाए।
संसारिक अंधकार सब,
पल में दूर भगाए॥
जीवन की राहों में भटकने के पश्चात, व अंततः मनुष्य समझ लेता है कि संसार केवल एक मार्ग है, मंज़िल नहीं। संसार के अनुभव ही उसे ईश्वर तक पहुँचने की प्रेरणा देते हैं। जब मन संसार से ऊपर उठकर ईश्वर की ओर मुखरित होता है, तब जीवन की यात्रा पूर्ण अर्थ पा लेती है।
इस प्रकार देह से देवालय तक की यात्रा केवल बाहरी परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण की यात्रा है,जहाँ मनुष्य संसार के वैभव से आगे बढ़कर ईश्वर के अनंत प्रकाश में अपने जीवन का सच्चा अर्थ खोज लेता है।
माया-मोह से उठ चलो,
खोजो अंतर आलय।
विंध्य कहे यह पंथ है,
देह से देवालय॥
साधना मिश्रा विंध्य
लखनऊ उत्तर प्रदेश




