
बिन दिशा के भटकता, लक्ष्य-विहीन नर,
हर कदम पर उलझता, लक्ष्य-विहीन नर।
राह दिखती नहीं, धुंध में खो गया,
खुद से ही रोज़ लड़ता, लक्ष्य-विहीन नर।
स्वप्न तो देखता है ऊँचे गगन के मगर,
हौसलों से ही डरता, लक्ष्य-विहीन नर।
वक्त की हर घड़ी यूँ ही बीतती जा रही,
खाली हाथ ही रहता, लक्ष्य-विहीन नर।
जब ठान ले अगर दिल में एक मंज़िल कभी,
तब बदल भी तो सकता, लक्ष्य-विहीन नर।
सीख ले आज ही, अर्थ जीवन का तू,
वरना यूँ ही रहेगा, लक्ष्य-विहीन नर।
बीना पाटनी उत्तराखंड पिथौरागढ़




