
कौन कहता है बेटियों की बिदाई मायके से बस एक बार होती है,
माँ-बाप जब तक, रहते है हर विदा में वही कसक वही दर्द रहता है।
हर बार उस आँगन से निकलते वक़्त
दिल फिर बचपन में लौट जाता था,
सामान के साथ-साथ
अपना भी कोई हिस्सा वही छूट जाता था।
जैसे-जैसे सामान बाहर आने लगता,
बाबूजी का चेहरा और भी भारी हो जाता,
शब्द चुप रहते,
पर आँखों का दर्द सब कह जाता।
माँ का शांत होकर
हर सामान को बाँधना,
मानो अपने आँसू
गाँठों में छुपा देना।
वो मुस्कान जो ढाल बनी रहती थी,
अंदर ही अंदर टूट जाती थी,
बेटी की हर बिदाई
माँ-बाप के दिल में
फिर से जन्म ले जाती थी।
कह दो उनसे,
बेटियों की बिदाई एक बार नहीं होती,है
माँ-बाप के जीते जी
हर बार उतनी ही पीड़ा होती है दिल मे।
पूनम त्रिपाठी
गोरखपुर




