आलेख

मृत्यु की दावत और तम्बाकू सेवन

विद्यावाचस्पति उदयराज मिश्र

मानव सभ्यता के विकासक्रम में अनेक पदार्थ ऐसे रहे हैं जिनका प्रारम्भिक उपयोग सीमित अथवा विभिन्न औषधीय प्रयोजनों के लिए हुआ, किंतु कालांतर में वे सामाजिक व्यसन का रूप ले बैठे। तम्बाकू भी ऐसी ही एक वस्तु है जिसने आधुनिक समाज में व्यापक स्थान बना लिया है। सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांस के राजनयिक जीन निकोट ने यूरोप में तम्बाकू के प्रयोग को लोकप्रिय बनाया। उनके नाम पर ही तम्बाकू में पाए जाने वाले प्रमुख मादक तत्व को निकोटिन कहा जाने लगा। यद्यपि तम्बाकू का उद्गम अमेरिकी महाद्वीप में माना जाता है, किंतु 16वीं–17वीं शताब्दी में व्यापारिक विस्तार के साथ यह एशिया और यूरोप सहित लगभग पूरे विश्व में फैल गया। भारत में भी मुगल काल के समय इसका प्रवेश हुआ और शीघ्र ही यह सामाजिक आदत का रूप ले बैठा।
रसायन विज्ञान की दृष्टि से तम्बाकू अल्कालॉयड वर्ग का एक पदार्थ होता है। अल्कालॉयड वे कार्बनिक यौगिक होते हैं जिनका मानव शरीर पर गहरा जैविक प्रभाव पड़ता है। इसी वर्ग में भाँग, धतूरा, अफीम, मॉर्फीन और कोकीन जैसे मादक पदार्थ भी सम्मिलित हैं। इतिहास में यह उल्लेख मिलता है कि यूनानी दार्शनिक सुकरात को राज्यद्रोह के आरोप में हेमलॉक नामक विष पीने की सजा दी गई थी, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। हैमलॉक जहर धतूरे के बीजों को पीसकर उसके द्रवित रूप में बनाया जाता है। यह घटना इस तथ्य को रेखांकित करती है कि अल्कालॉयड वर्ग के अनेक पदार्थ अत्यंत तीव्र और घातक प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने तम्बाकू के दुष्प्रभावों को स्पष्ट रूप से प्रमाणित किया है। विश्व स्वास्थ्य संतान के अनुसार तम्बाकू सेवन विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु का कारण बनता है। इनमें से लगभग 12 लाख लोग ऐसे होते हैं जो स्वयं तम्बाकू का सेवन नहीं करते, बल्कि अपने आसपास या संगी साथियों के धूम्रपान करने से पर-धूम्रपान के कारण प्रभावित होते हैं। भारत में भी स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।भारतीय परिवार कल्याण और स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 13–14 लाख लोगों की मृत्यु तम्बाकू से संबंधित बीमारियों के कारण होती है।
ध्यातव्य है कि तम्बाकू का सेवन अनेक रूपों में किया जाता है,जैसे खैनी,जर्दा, गुटखा,बीड़ी,सिगरेट, हुक्का,चिलम आदि। जब तम्बाकू को चूने के साथ मिलाकर अथवा धूम्रपान के रूप में प्रयोग किया जाता है, तब निकोटिन रक्त के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचकर तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। इसके साथ ही तम्बाकू के धुएँ में लगभग 7000 से अधिक रासायनिक तत्व पाए जाते हैं, जिनमें से अनेक कैंसरकारक होते हैं। फलतः तम्बाकू सेवन से फेफड़ों का कैंसर,मुख एवं गले का कैंसर,हृदय रोग,उच्च रक्तचाप,श्वसन रोग,प्रजनन क्षमता में कमी और गर्भस्थ शिशु के विकास में बाधा आदि समस्याएं उत्पन्न होती हैं।भारत में विशेष रूप से चबाकर खाए जाने वाले तम्बाकू उत्पादों के कारण मुख कैंसर के मामलों की संख्या विश्व में अत्यधिक पाई जाती है।
गौरतलब है कि तम्बाकू केवल स्वास्थ्य को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या भी है। तम्बाकू से उत्पन्न रोगों के उपचार पर होने वाला व्यय अत्यंत अधिक होता है, जिससे परिवारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। गरीब और निम्न आय वर्ग के लोग इस व्यसन के कारण अधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा तम्बाकू पर व्यय हो जाता है। इस प्रकार यह व्यसन व्यक्ति के स्वास्थ्य के साथ-साथ परिवार की आर्थिक संरचना को भी कमजोर करता है।
भारतीय आयुर्वेदिक परंपरा भी नशे और व्यसनों के प्रति अत्यंत सावधान रहने की शिक्षा देती है। चरक संहिता में स्वस्थ जीवन के लिए संयम और हितकर आहार-विहार को आवश्यक बताया गया है—
“नित्यं हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः।
दाता समःसत्यपरःक्षमावान्आप्तोपसेवी च भवत्यरोगः॥”
अर्थात जो व्यक्ति हितकर आहार-विहार का पालन करता है और इन्द्रिय विषयों में आसक्त नहीं होता, वही वास्तव में निरोग रहता है। इसी प्रकार सुश्रुत संहिता में रोगों से बचने का सर्वोत्तम उपाय बताया गया है—
“निदानपरिवर्जनं व्याधिनां सर्वोत्तमं उपचारम्।”
अर्थात रोग के कारणों से दूर रहना ही रोग की सर्वोत्तम चिकित्सा है।भारतीय धर्मग्रंथों में भी संयम और आत्मनियंत्रण को जीवन का मूल आधार माना गया है। महाराज मनु कृत मनुस्मृति में कहा गया है—
“इन्द्रियाणां च सर्वेषां यद्येकं क्षरतेन्द्रियम्।
तेनास्य क्षरते प्रज्ञा द्रुते पात्रादिवोदकम्॥”
अर्थात यदि इन्द्रियों में से एक भी इन्द्रिय अनियंत्रित हो जाए तो उससे मनुष्य की बुद्धि उसी प्रकार नष्ट होने लगती है जैसे छिद्रयुक्त पात्र से जल धीरे-धीरे बाहर निकल जाता है। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि व्यसन और इन्द्रियासक्ति अंततः बुद्धिनाश का कारण बनते हैं।
भारतीय सुभाषित परंपरा में भी तम्बाकू सेवन की निन्दा मिलती है। सुभाषितरत्नानिभण्डागार में वर्णित एक प्रसिद्ध श्लोक इस संदर्भ में उल्लेखनीय है—
तमाखु पत्रं भज राजेन्द्र माज्ञानदायकम्।
तमाखु पत्रं भज राजेन्द्र माज्ञानदायकम्।।
इस श्लोक की एक व्याख्या में मंत्री राजा से कहता है—“हे राजन! तम्बाकू के पत्तों का सेवन मत कीजिए, क्योंकि यह अज्ञान और बुद्धिनाश का कारण है।” दूसरी व्याख्या में ‘तमाखु पत्रम्’ को लक्ष्मी का प्रतीक मानकर ज्ञान और समृद्धि की प्राप्ति का संकेत किया गया है। इस प्रकार यह श्लोक अलंकारिक शैली में संयम और विवेकपूर्ण जीवन का संदेश देता है।
भारत में तम्बाकू के नियंत्रण के लिए कानूनी व्यवस्था भी की गई है। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषिद्ध किया गया है तथा तम्बाकू उत्पादों के विज्ञापन पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। इसके अतिरिक्त पैकेटों पर स्वास्थ्य चेतावनी अनिवार्य की गई है। इन सब प्रयासों का उद्देश्य समाज को तम्बाकू के दुष्प्रभावों से बचाना है।तम्बाकू के विरुद्ध जनजागरण के लिए विश्व स्तर पर विश्व तम्बाकू निषेध दिवस प्रतिवर्ष 31 मई को मनाया जाता है। यह दिवस समाज को यह स्मरण कराता है कि तम्बाकू केवल एक व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
समग्रतः यह स्पष्ट है कि तम्बाकू वास्तव में एक धीमा विष है जो धीरे-धीरे मनुष्य के शरीर और जीवन को क्षीण कर देता है। स्वस्थ समाज की कल्पना तभी संभव है जब व्यक्ति, समाज और शासन—तीनों स्तरों पर तम्बाकू के विरुद्ध ठोस प्रयास किए जाएँ। जनजागरण, कठोर नीतियाँ और व्यक्तिगत संयम—इन तीनों के समन्वित प्रयास से ही इस समस्या का समाधान संभव है।
अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तम्बाकू वास्तव में “उत्पाद” नहीं बल्कि “मृत्यु की दावत” है, जिसका मूल्य अंततः उपभोक्ता को अपने स्वास्थ्य और जीवन से चुकाना पड़ता है।
— डॉ. उदयराज मिश्र

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