आलेख

नैतिकता का ह्रास सर्वप्रथम उच्च -स्तर पर होता है

डॉ. शीलक राम आचार्य

टका धर्म टका कर्म,टका ही परमं पदम्।यस्य गृहे नास्ति टका, हा टका टकटकायते।टका है तो सब कुछ टकाटक है। यदि टका नहीं है,तो सब कुछ व्यर्थ है।टका यानि पैसा जेब में नहीं है तो जीवन गुलामी और दासता में सड़ता रहता है। पैसा भगवान् नहीं है लेकिन सांसारिक व्यक्ति के लिये पैसा भगवान् से कम भी नहीं है। यदि भगवान् और पैसे दोनों को सामने रख दिया जाये,तो सांसारिक पैसे को लेकर भाग जायेगा। उनके लिये भगवान् तो कभी भी मिल सकता है लेकिन पैसा हाथ से निकल गया तो दोबारा वापस आने की संभावना खत्म हो जाती है।जब किसी व्यक्ति पर मुसीबत आती है, तो पैसा ही सबसे बड़ा मददगार, भगवान् और सहारा होता है। मित्र, प्यारे,दोस्त आदि सभी किनारा कर लेते हैं। पैसा सब जगह चलता है। विज्ञान,धर्म,अध्यात्म,योग,राजनीति,व्यापार,शिक्षा,शोध खेती-बाड़ी, परिवहन, बिमारी,आवास,सैर -सपाटा, पोशाक,भोजन, खेलकूद आदि सब जगहों पर पैसा राज करता है। सभी जगहों पर पैसा ही सहारा सिद्ध होता है। पैसे से कुछ भी खरीद और बेच सकते हो। यदि गांठ में पैसा है तो सम्मान है, इज्जत है, प्रतिष्ठा है, नमस्ते है, चरणस्पर्श है। पैसा नहीं है तो इनमें से कुछ भी नहीं है। सांसारिक व्यक्ति पैसे को महत्व देता है। पैसे के बगैर कोई भी सम्मान करता। व्यक्ति कितना भी बड़ा अपराधी,चोर, बलात्कारी, भ्रष्टाचारी, कुटिल, झूठा और हो नीच प्रवृत्ति का हो, यदि उसके पास पैसा है,तो सब उसको सम्मान देते हैं। पैसे के बगैर किसी चिकित्सक के पास जाओ, किसी शिक्षा- संस्थान में जाओ, किसी हवाई अड्डे पर जाओ, रेलवे स्टेशन पर जाओ, सब्जी मंडी में जाओ, किसी न्यायालय या तहसील में जाओ,होटल में जाओ; आपको धक्के मारकर फेंक दिया जायेगा। पैसा है तो सर्वत्र वाह- वाह है लेकिन पैसा नहीं है तो सर्वत्र आह -आह है। पैसा सर्वत्र जिंदाबाद है और गरीबी सर्वत्र मुर्दाबाद है।गरीब की जोरु,जमीर,जमीन, जवानी,उसका जन्म,कर्म और सब कुछ दूसरों की अय्याशी और सुख सुविधाओं के लिये है। आज के सिस्टम में यदि व्यक्ति के पास पैसा नहीं है तो नौकरी और छोकरी दोनों पास में फटकेंगे भी नहीं। शादी ब्याह में भी पैसा चलता है। यदि किसी लड़के के पास पैसा नहीं है तो कोई लड़की भी उससे शादी करने को तैयार नहीं होगी, शादी में भी बैंक बैलेंस, नौकरी, जमीन -जायदाद, हैसियत देखे जाते हैं। लड़की की शादी तो हो भी जायेगी लेकिन लडका बेचारा कंवारा ही रह जायेगा। पैसा कमाने के लिये ही तो भारतीय युवा विदेशों में जाकर मेहनत- मजदूरी करते हैं।वह पर वो अपने सारे मान,सम्मान, प्रतिष्ठा आदि को दांव पर लगाकर पैसा कमाते हैं। पैसा कमाने गये भारतीय युवाओं को अमरीका से किस तरह बेड़ियों में जकड़कर भारत वापस लाया जा रहा है,यह हम सबके सामने है।
किसी कथाकार को सुन रहा था। वैसे कथाकारों ने भारत के माहौल को बिगाड़ा ही अधिक है। लेकिन इस कथाकार की एक बात मुझे बहुत बढ़िया लगी। उनके अनुसार औलाद के पालन पोषण के नये -नये दौर चल रहे हैं। कुछ दशक पहले के बच्चे अपने बड़ों के आदेश को बिना किसी ना नकुर के मानते थे।इसेआदेशपरक पीढ़ी कह सकते हैं। फिर नया दौर आया विचारपरक पीढ़ी का। बड़ों के कहे पर विचार होने लगा। बड़ों की कही हुई बातों को एकदम से मानना बंद हो गया। फिर तीसरा दौर आया वादपरक पीढ़ी का। बड़ों से वाद- विवाद और तर्क- वितर्क शुरू हो गया। और फिर आया चौथा दौर नकारपरक पीढ़ी का।यह इस समय पर प्रचलित है। बड़े कुछ भी कहें,ना तो कहेंगे ही। औलाद बिना सोचे -समझे बड़ों की किसी भी सीख, उपदेश और बात को एकदम से नकार देने को तत्पर रहते हैं। इससे परिवार में विवाद और झगडे बढ रहे हैं। औलाद बड़ों को कोई सम्मान देने को तैयार नहीं है।हर बात पर झगड़ा,हर बात पर विवाद शुरू हो जाता है। यदि इसकी तह में जायें तो मालूम होगा कि इसके लिये अभिभावक ही अधिक जिम्मेदार हैं। अभिभावकों ने अपनी औलाद को आधुनिक बनाने के फेर में सनातन जीवनमूल्यों की सीख का न तो खुद पालन किया तथा न ही अपनी औलाद को इनकी शिक्षा दी।बस,ले -देकर आगे बढना ही मुख्य लक्ष्य बना दिया गया।साध्य ही मुख्य हो गया और साधन गौण होकर विकृत हो गया। कुछ भी करके सफलता पानी है। भ्रष्टाचार,छल, कपट आदि कुछ भी करके पद, प्रतिष्ठा और दौलत कमाना बाकी रह गया। अब्राहमिक जीवन- शैली को भरपूर सम्मान दिया गया। कुछ भी अनैतिक करके खुद का सुख मुख्य रह गया।इस अंधानुकरण में न घर के रहे तथा न घाट के रहे।अब जब बिगाड़ हर स्तर पर फैल गया है तो अभिभावक और धर्मगुरु चिल्ला रहे हैं कि औलाद हमारी कोई बात नहीं सुनती है। खुद ही सिस्टम को बर्बाद किया है तो सुधार भी खुद ही करना होगा। लेकिन विडंबना यह है कि किसी भी स्तर पर सुधार की कोशिशें नहीं हो रही हैं। राजनीति, मजहब, परिवार,संप्रदाय,समाज, शिक्षा आदि हरेक क्षेत्र में सबका ध्यान साध्य पर टिका हुआ है। आबादी बहुत अधिक बढ़ गई है लेकिन हर स्तर पर सिस्टम बदहाल है। बेरोजगारी चरम पर है। अपराध की तो पूछो ही मत। अधिकांश अपराधी तथाकथित बड़े लोगों के सरंक्षण में मौजूद हैं।
साढ़े इक्यासी करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन दिया जा रहा है। यदि मुफ्त भोजन मिलेगा तो कोई काम क्यों करेगा?जो काम करने वाले लोग हैं,उनका मनोबल भी टूट रहा है।जब बिना मेहनत किये सब कुछ मिल रहा है तो फिर मेहनत क्यों करना?इस सब खेल में चिंतन, तर्क, विचार और विवेक हर स्तर पर गायब है।इसीलिये तो जिन लोगों को अपनी नाकारा और भ्रष्ट सत्ता को लंबे समय तक कायम रखना है,वो दर्शनशास्त्र, नीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र,ज्ञानशास्त्र जैसे विषयों के घोर विरोधी हैं। सिस्टम ऐसा बना दिया गया है कि क्यों, कैसे, क्या,कब,किस तरह के प्रश्न जनता- जनार्दन के चित्त में उठने ही बंद हो गये हैं। सत्ता के पास इन प्रश्नों के कोई जवाब मौजूद नहीं हैं, इसलिये यह सारा ड्रामा करना पड़ रहा है।जिस दिन जनता -जनार्दन इस प्रकार के प्रश्न उठाना शुरू कर देगी,उसी दिन भ्रष्ट और नाकारा सत्ता के पैर उखड़ जायेंगे।
नैतिक- मूल्यों का ह्रास सर्वप्रथम उच्च -स्तर पर होता है। इसके पश्चात् ही जनता- जनार्दन भ्रष्टाचार में लिप्त होना शुरू होती है। जनता जनार्दन को मालूम हो जाता है कि नेता, धर्मगुरु, व्यापारी,शिक्षक, पुलिस आदि सभी भ्रष्ट हैं,तो वह सत्यनिष्ठ, नैतिक और मेहनती क्यों रहे? भारत में बिगाड़, अनैतिकता और आचारहीनता इतनी गहराई तक फैले हुआ हुये हैं कि सुधार के लिये बहुत अधिक मेहनत की आवश्यकता है। लेकिन सभी उपदेश देने में लगे हुये हैं। सुधर कोई नहीं रहा है। अधिकांश खुद में सुधार न करके दूसरों को ही सुधार रहे हैं। परिणाम सबके सामने है।
खुद सुधरोगे तो जग सुधरेगा की सीख देने वाले भी अपने पूरे जीवन में एक भी ऐसा व्यक्ति तैयार नहीं कर पाये कि जो उनकी विचारधारा और आचरण को आगे बढा सके।उनको भी अपने परिवार में ही आसक्ति रही। पारिवारिक मोह को वो भी छोड़ नहीं पाये।
धन, दौलत,मोह, माया,राग के विरोध में दिन- रात प्रवचन झाड़ने वाले कथाकार, महात्मा, धर्मगुरु, सुधारक आदि कुछ ही समय में अरबपति कैसे बन जाते हैं।नारी को नर्क का द्वार बतलाने वाले महात्माओं के पास नारियों की भीड़ सर्वाधिक मौजूद रहती है। अहिंसा और सद्भाव का जोरदार समर्थन करने वाले लोग आये दिन जातीय और सांप्रदायिक झगड़ों में लिप्त पाये जाते हैं। खेती-बाड़ी और किसानी को भारत का मूल रोजगार मानने वाले लोग किसानों के हित में कभी नहीं बोलते हैं।खाना, पीना,हगना,मूतना,ओढना, पहनना आदि का सब काम नीची कही जाने वाली जातियां करती हैं लेकिन तथाकथित धार्मिक कहे जाने वाले पौराणिक लोग इन्हीं मेहनतकश लोगों को मूलभूत अधिकार देने के समर्थन में नहीं हैं। धन,दौलत,माया मोह,राग के विरोध में प्रवचन करने वाले धर्मगुरु अमीर होते जाते हैं लेकिन दिन -रात धन, दौलत,माया, मोह,राग के पीछे पड़े लोग बदहाली का जीवन जीते हैं। बड़ा अजीब चल रहा है। नई राष्ट्रीय शिक्षा- नीति तथा शिक्षा में सुधार पर विभिन्न मंचों से व्याख्यान देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने वाले प्रोफेसर समय पर अपनी कक्षाएं कभी नहीं लेते हैं। मेहनतकश विद्यार्थियों को प्रथम श्रेणी में आने के लिये एडी चोटी का जोर लगाना पड़ता है लेकिन अपने प्रोफेसर की सेवा, चापलूसी और जी हुजूरी करने वाले विद्यार्थी सहज में ही गुड फर्स्ट डिवीजन प्राप्त कर लेते हैं। मरीजों को सात्विक, हल्का, शाकाहार और पौष्टिक आहार- विहार अपनाने की सीख देने वाला चिकित्सक अक्सर स्वयं के जीवन में शराबी,कबाबी,शबाबी और उन्मुक्त भोगी होता है।
जो व्यक्ति अच्छा जीवन जीन का इच्छुक है,उसे अवसर नहीं मिलता है। लेकिन जिनके पास अच्छा जीवन जीने के सभी अवसर और सुविधाएं मौजूद होती हैं,वो लोग अक्सर बुरे बनकर रह जाते हैं।जो पास में होता है,उसका सम्मान नहीं होता है लेकिन जो पास में नहीं होता है,उसकी प्राप्ति के लिये दिन -रात एक कर देते हैं।रात सोने के लिये बनी हुई है लेकिन फिर भी अधिकांश लोग रात को जागते हैं और दिन में सोते हैं।या फिर देर से सोते हैं और देर से उठते हैं।
सभी यह नैतिक सीख देते हुये मिल जायेंगे कि बहन- बेटियां सबकी एक समान होती हैं। लेकिन कितने लोग ऐसे हैं जो दूसरों की बहन- बेटियों को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं? सच यह है कि अधिकांश लोगों की दृष्टि में कामुकता,वासना और भोग की कामना छिपी हुई होती है। यदि यह सच नहीं होता तो आज बहन- बेटियां इतना असुरक्षित नहीं होती, उनके साथ आये दिन छेड़खानी की घटनाएं नहीं होती तथा उनसे बलात्कार नहीं होते।इस धरती पर शिक्षा, उपदेश, जानकारी और प्रवचनों की कमी कभी नहीं रही है।कमी रही है उनको निज आचरण में स्थान देने की।यह कमी यदि पूरी हो जाये तो सबकी बहन -बेटियां सुरक्षित हो जायेंगी। शिक्षा,उपदेश,जानकारी, प्रवचन देने वाले लोगों को भलि तरह से मालूम रहता है कि जो कुछ वो कह रहे हैं,वो उसको स्वयं भी नहीं मानते हैं। दूसरे लोग उनकी बातों को गंभीरता से महत्व देंगे,यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है।
कितने लोग दूसरों की सहायता केवल सहायता को सहायता सोचकर करते हैं? दूसरों की सहायता करने के बदले वापसी में उनसे कोई सहायता पाने की आशा नहीं रखकर उनकी सहायता करना ही सच्ची सहायता होती है। यह सही है कि व्यक्ति को व्यावहारिक होना चाहिये, लेकिन व्यावहारिक होना सिर्फ संसार में काम आयेगा। व्यावहारिक होने से भौतिक सफलता मिल सकती है, मानसिक शांति और बौद्धिक संतोष नहीं।मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक,चैतसिक और आत्मिक स्तरों पर यह काम नहीं आयेगा। यहां पर तो अपना निज आत्मस्वरुप ही प्रधान होता है। व्यावहारिक लोग किसी अन्य की सहायता यह सोच समझकर करते हैं कि यह व्यक्ति भी भविष्य में मेरे किसी काम का हो सकता है। भीतरी और बाहरी जीवन में संतुलन आवश्यक है। इसका निष्कर्ष यह है कि व्यक्ति को विवेक से काम लेना चाहिये। अन्यथा लोग एक दिन आपको नंगा करके सड़क पर लाकर खड़ा कर देंगे। सहायता लेते समय हावभाव विनम्र होते हैं लेकिन बाद में अधिकांश लोग पल्टी मार जाते हैं। निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करने वाले लोग मानसिक रूप से शांत, बौद्धिक रूप से संतुष्टि और आत्मिक रूप से खुद में ठहरकर आनंदित होते हैं। लेकिन भौतिक रूप से गरीब, बदहाल और उपेक्षित हो जाते हैं। अधिकांशतः यही देखा जाता है।
……….
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!