साहित्य

मौन मुखर हो जाये

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

मौन मुखर हो जाये, तब कविता बनती है,
झुके नयन सब कह जायें, कविता बनती है।
शान्त सरोवर की लहरें, कम्पित कमल देख,
भँवरे का भीतर होना, तब कविता बनती है।

कोई जख्म कुरेदे गहरे, मन से आह निकलती,
चेहरे पर अहसास झलकता, कविता बनती है।
जख्मों पर प्यार का मरहम, राहत देता लगता,
अपने पन का भाव छलकता, कविता बनती है।

जाने कितने स्वप्न संजोये, तामीर करेंगे जतन संजोये,
स्वप्न अधूरे फिर भी आशा, आशाओं से कविता बनती है।
टूटा मन- थका सा तन, व्याकुल व्यथित जीवन लगता,
टूटे मन में पीर समन्दर, नैनों में खारेपन से कविता बनती है।

अल्हड़ यौवन की अंगड़ाई, कल कल नदियों की अगुआई,
झरनों के झरने से उत्पन्न, संगीतों से कविता बनती है।
प्रातः काल भौंरों का गुंजन, अलसाई कलियों का चुम्बन,
चटकी जब मदमस्त कली कहीं, तब कविता बनती है।

कविता तो भावों की अनुभूति, कहीं रंग ब्रूस और कूँची,
कैनवास पर बिखरे रंगों से, भावों की कविता बनती है।
शिल्पकार भी कविता लिखता, शिल्प में भावों को गढ़ता,
जब शिल्प मुखर हो बातें करता, तब कविता बनती है।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन

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