
कहॉ कहॉं तक जाती है दृष्टि
कहॉं कहॉं तक उनके विचार
सीमित नहीं इस जहान तक कवि
यें पहुँच जाते हैं क्षितिज के उस पार
दे जाते हैं यें वहाँ पर दस्तक
कोई भी न पहुंचे जहाँ तक
पहुंचे न हर जगह मंदार
यें पहुँच जाते हैं क्षितिज के उस पार
दर्शित न होती हो जो वस्तु
यें दे देते उसको आकार
अनगिनत आकृति बना लेते
यें पहुँच जाते हैं क्षितिज के उस पार
श्रवित न हो जो कभी बोली
वह सुन लेते हैं रचनाकार
कभी किसी ने न सोचा हों
यें पहुँच जाते हैं क्षितिज के उस पार
मीनाक्षी शर्मा ‘मनुश्री




