साहित्य

मेरे एहसास

तृषा सिंह

कभी कभी घने दिखने वाले दरख़्त
अंदर से बेहद कमज़ोर और खोखले भी होते हैं
छांव तो सबको देते हैं पर जब टूटकर गिरते हैं
कोई भी उन्हें संभाल नहीं पाता
एक सुकून होता हैं दरख़्त को कि अब भी
मेरी लकड़ियां किसी के काम आऐंगी।
स्वरचित मौलिक रचना
तृषा सिंह
देवघर झारखंड

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!