
मैं बहुत ज्यादा समय से व्यंग्य रचनायें नहीं लिख रहा हूँ बल्कि डेढ़ दो सालों से लिखने लगा। अधिकांशतः मैं गलत चीजों के लिये व्यंग्यात्मक शब्दों का इस्तेमाल करता रहता हूँ। एक बार यूँ ही एक रचना व्यंग्यात्मक भारतीय संस्कृति पर लिख दिया। यह व्यंग्य हास्य से भी भरपूर था। पढने वालों ने वाह-वाह कर दिया। तारीफों का पुल बांध दिया। इतनी जबरदस्त तारीफ हुई तो मेरे अंदर प्रबल भावना बढ़ी कि मुझे हास्य से ओत-प्रोत व्यंग्य लेख लिखना चाहिये।
और मेरे हास्य-व्यंग्य लेखन का पुष्प खिलने लगा और इसकी खुशबू दूर तक फैलने लगी। शब्दों में चार चांद लगने लगा। लोगों की भरपूर प्रशंसा से मेरा ह्रदय गदगद होने लगा और मेरे कलम की नोंक से व्यंग्य की धार ऐसी निकली कि जो पढ़ता। उसे लगता पूरी कीमत वसूल हो गयी है।
एक चीज मैं बताना चाहूँगा कि अक्सर बोलचाल की भाषा में भी मेरा हास्य-व्यंग्य से भरा वाक्य निकलता रहता है। आनन्ददायिनी शब्द तो रहते हैं लेकिन उसमें व्यंग्यात्मक शब्दों की छटा रहती है। कुछ लोग तो हंसकर टाल जाते हैं। कुछ को गहरा आघात लगता है और मुंह फेर कर चल देते हैं। कुछ तो ऐसा भड़क जाते हैं। जैसे यह व्यंग्य की पंक्तियाँ उन्हीं के लिये सजाये गयें है।
मैं इलाहाबाद का हूँ इसलिए इलाहाबादी लहजे से मेरा व्यंग्य सजा रहता है। कुछ इलाहाबाद के साहित्यकारों का भी मेरे लेखन से मुंह टेढ़ा हुआ है। नाक भौं सिकुड़ी सी रहती है। चेहरा तमतमाया सा रहता है। लेकिन अब मेरा काम ही हंसी के साथ व्यंग्य लिखना। अब इसमें मेरा थोड़ी कोई दोष है। जो लपेटे में आया। लपेट लिया जाता है।
मेरी मां अक्सर गलत बातों पर व्यंग्य बोल देती है। जिसका असर शायद मेरे अंदर भी रहा है। उसी व्यंग्यात्मक लहजे में मैं भी व्यंग्यात्मक तीर छोड़ देता हूँ। जो सामने आया, उसका घायल होना लगभग तय है। इस तरह से मेरा हास्य-व्यंग्य लेखन की शुरुआत हुई। अभी मैं नौसिखिया लेखक हूँ।
हरिशंकर परसाई जी की तरह मैं लम्बे लेख नहीं लिखता हूँ। मेरे हास्य व्यंग्य लेख लघु होते हैं। अब जमाने के अनुसार लोगों के पास समय नहीं है कि बड़ा बड़ा लेख पढ़ें। कम समय में सारा काम होना लोग पसंद करते हैं। मेरा हास्य व्यंग्य लघु होता है। हास्य से भरपूर होता है तथा घातक भी होता है और मारक।
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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज



