साहित्य

तुम कहाँ खो गये

सुमन बिष्ट

 

सिसकता है दिल, हर रोज़ तेरी यादें सताती हैं,
गिले शिकवे इतने की
खामोशियां भी गुनगुनाती हैं।

लबों पर ठहरे कई सवाल
और जवाब बिखरे ख़्वाबों में,
तुझे ढूँढती हूँ मैं अब भी,हर
बीते हुए एहसासों में।

वो कल जो हँसती थी तेरे संग, धूप-सा उजली थी ,
आज अतीत की गलियों में खो,धुँधला गयी थी।

वक़्त ने ओढ़ ली हैं परतें, और रिश्ते बदल डाले हैं,
कुछ सपने अधूरे रहकर, खुद से ही रूठने वाले हैं।

दिल में अब भी अरमानों की चिंगारी बाकी है,
थके हुए परों में अब भी थोड़ी ताक़त बाकी है।

उड़ तो सकती हूँ फिर से मैं अपने ही आसमान में,
पर फिर से वो साथी साथ कहाँ से लाऊँ उड़ान में।

तू भी अब वैसा नहीं रहा, जैसा कल तक था,
तेरी बातों में अब मौसम-सा बदलता रंग दिखा।

दुनिया की चाल में ढलकर तू आगे बढ़ तो गया,
मेरे पीछे छूटे एहसासों को बस यादों में रख गया।

मैं भी सीख लूँ बदलना, ये हुनर आसान नहीं,
हर बदलता चेहरा अपनाना मेरी पहचान नहीं।

तेरे जैसा अंदाज़,वो सहजता,वो धैर्य, वो अपनापन,
कहाँ से लाऊँ मैं अब वो सादा सरल वही इंसान।

इसलिए आज भी ठहरी हूँ उसी मोड़ पर अकेली,
जहाँ तू था,मैं थी, और यादों की दुनिया सुनहरी।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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