
चार दीवारों के बीच बसी,
एक छोटी-सी दुनिया थी,
जहाँ हर दिन नई कहानी,
हर पल में खुशियाँ जुड़ी थीं।
शुरुआत में मन न लगता था,
स्कूल जाना बोझ सा लगता,
पर धीरे-धीरे वही जगह,
दिल का सबसे खास हिस्सा बनता।
अजनबी चेहरे, अनजानी राहें,
कब दोस्त बन गए पता न चला,
हँसी-ठिठोली, छोटी शरारतें,
इनमें ही हर दिन ढलता चला।
पढ़ाई के संग मस्ती भी थी,
हर गलती पर थोड़ी डाँट भी,
पर फिर वही गुरु का साया,
देता था स्नेह और बात भी।
डाँट खाकर भी मुस्कुराते,
फिर उनके पास ही चले जाते,
एक अपनेपन का रिश्ता था,
जो हर दूरी को मिटा जाते।
वो स्कूल नहीं, एक घर था,
जहाँ हर दिल को सुकून मिला,
हर कोना यादों से भरा,
हर लम्हा जैसे अनमोल खिला।
अब वो दिन लौटकर न आएँगे,
ना वो मस्ती, ना वो बहाने,
पर दिल में हमेशा बसेंगी,
वो यादें और वो तराने।
अजनबी से खास बने थे,
उस चौखट के अंदर हम,
आज बिछड़ रहे हैं सब,
पर यादों में रहेंगे हरदम।
रिया राणावत
कालीदेवी, झाबुआ (मध्य प्रदेश)




