साहित्य

मूरख की बस्ती

उदय कशोर साह

मूरख की बस्ती में   मूरख है सरपंच
बिना बुलाये ही बन     जाता ये  पंच
खुद की गलती इनको नजर ना आता
औरों की गलती पे दोषी बना ठहराता

मूरख की बस्ती में मूरख बना अधिवक्ता
बिना डिग्री का बन  जाता ये न्यायकर्त्ता
मूरखों की समाज में इनका मान सम्मान
इनके आगे नतमस्तक हो जाता विद्वान

मूरख की बस्ती में मूरख बना सिरमोर
किसी बात पे करता है ये      बड़ी गौर
मछली बाजार जैसी मचाता है ये शोर
इनकी तर्क का कहाँ है कोई भी तोड़

मूरख की बस्ती में    मूरख है चहुँओर
इनके हाथ में गाँव की है       बागडोर
आपकी सेवा में मिलेगें रात हो या भोर
ज्ञानी भी करते स्वागत दोनों कर जोड़

मूरख की बस्ती में मूरख बड़ा सयाना
इनके नजर में फीका है नया   जमाना
समझदार हो तो नजदीक से  पहचाना
दूर से ही पाना है ज्ञान विज्ञान नजराना

उदय कशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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