साहित्य

मुक्तक

पंडित मुल्क राज "आकाश"

बसंत की बहार में मधुर तान घोलती,
मधुर कुक से हृदय के द्वार खोलती।
रंग है काला मगर वाणी में मिश्री भरी,
आम के डाल पर बैठ मीठा सुर घोलती।

चुपके से आती है वो, संदेश प्यार का लेकर,
सबको अपना बना लेती है सुरो का उपहार देकर।
मौन रहकर भी जो सबको, पता जीना सिखा देती है,
हैरान है सब उसकी अद्भुत झंकार देखकर।

पंडित मुल्क राज “आकाश”

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