
अनुपम रूप वितान, जगत में सबसे न्यारी।
ईश्वर का वरदान, श्रेष्ठ है नर से नारी॥
सबको देती मान, नित्य पोषण है करती।
करते हम गुणगान, सभी का दुख है हरती॥
अद्भुत रूप अनूप, यही है सबकी जननी।
पत्नी का शुभ रूप, जिसे कहते हैं सजनी॥
बेटी है शुचि रूप, दिव्यतम और दुलारी।
महिमा जग विख्यात, मनोहर होती नारी॥
करती नर से प्यार, जगत नारी बिन सूना।
जिम्मेदारी खूब, निभाती नर से दूना॥
होती शक्ति स्वरूप, नहीं होती बेचारी।
करो सदा सम्मान, अनोखी होती नारी॥
सुंदरतम प्रतिमान, सृष्टि की अनुपम रचना।
नारी गुण की खान, यही जीवन का रसना॥
भव्य रूप शुचिमान, मनोहर इसके नयना।
मृगनयनी माधुर्य, यही जीवन का गहना॥
कभी उड़ाती यान, कभी झाँसी की रानी।
नहीं असंभव काम, कभी बनती सेनानी॥
लक्ष्मी का शुभ रूप, यही है मातु भवानी।
शौर्य शील संघर्ष, विविधता भरी कहानी॥
© डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




