साहित्य

नारी तो नारायणी है

डॉ. राजेश कुमार शर्मा पुरोहित

कितनी सहनशील होती है नारी,
सागर-सी गहरी सोच रखती है।

परिवार को बखूबी संभालती है,
संस्कारों का बीजारोपण करती है।

नारी माँ के रूप में आशीष देती है,
वह पति को परमेश्वर मानती है।

बहन बन भाई को राखी बाँधती है,
नारी हर जगह अपना कर्तव्य निभाती है।

सियासत में इंदिरा-सी बन जाती है,
पी.टी. उषा-सी तेज़ दौड़ लगाती है।

साहित्य क्षेत्र में महादेवी बनती है,
लता-सी स्वर कोकिला कहलाती है।

तू अबला नहीं, अब सबला बन,
अपने हक के लिए बोलना सीख।

हर कर्तव्य पूर्ण करती है तू सदा,
अब अधिकारों के लिए आगे बढ़।

नारी जन्म देती, संस्कार देती है,
नारी जीवन में खुशियाँ भर देती है।

नारी तो नारायणी है, परमेश्वरी है—
आओ, सम्मान करें, प्रणाम करें।

नारी को लक्ष्मी, सरस्वती मान,
नारी को दुर्गा, काली, चामुंडा मान।

नारी को तू साक्षात भवानी जान,
नारी के इन रूपों को तू पहचान।

घर से मरघट तक नारी जा रही है,
हर मोर्चे पर काम संभाल रही है।

पिता की अर्थी को काँधा दे रही है,
बेटी के रूप में फ़र्ज़ निभा रही है।

-डॉ. राजेश कुमार शर्मा पुरोहित
कवि,साहित्यकार
भवानीमंडी
राजस्थान

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