
सृष्टि की जननी तू है नारी,
नर की सच्ची नारायणी तू है।
तू अन्नपूर्णा, तू वीणा वादिनी,
ज्ञान ज्योति की साधिनी तू है।
तू ही उमा, रमा और सीता,
तू राधा की मधुर कहानी।
तू ही दुर्गा, चंडी, कालिका,
तू संकटा भव-भय हरणी।
हर भावना की अभिव्यक्ति तू,
जीवन का मधुर अहसास है।
तू व्यक्ति मात्र नहीं जग में,
मानवता का विश्वास है।
संस्कृति की मर्यादा संजोकर,
युग-युग से घर को सँवारा।
भारतीय परंपरा की धारा,
तूने ही जग में विस्तार किया सारा।
लज्जा तेरा पावन आभूषण,
ममता तेरा सच्चा श्रृंगार।
कोमल हृदय, सहज ओजस्विता,
तेरा अनुपम दिव्य प्रकार।
प्यार की वह डोर तू नारी,
जो परिवारों को बाँधती है।
धर्म, नीति और मर्यादा की,
दीपशिखा बनकर साधती है।
आशा और विश्वास की कड़ियाँ,
नव जीवन में प्राण फूँकती।
तुझको न समझो अबला कोई,
तू शक्ति बन जग को झंकृत करती।
सिंह सवारी नवदुर्गा बन,
अधर्म अंधेरा हर लेती।
मोहन के छप्पन भोगों पर भी,
तुलसी बन श्रद्धा भर देती।
सच है यह जग के इतिहास में—
तेरा ही यश गान रहा।
हे नारी! तू शक्ति स्वरूपा,
सचमुच तू नारायणी हो।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




