साहित्य

नारीवाद/महिला दिवस

मधु वशिष्ठ

औरों की तो पता नहीं पर मुझे समझ में आता नहीं।

महिला दिवस या नारीवाद की जरूरत क्या है और यह किसके लिए है?

जोर जोर से बोलते हैं बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।
मुझे तो कभी किसी ने रोका टोका नहीं पढ़ाई के लिए ।
, मैं बच भी गई और पढ़ भी गई।

उम्र का दूसरा मोड़ भी आया, संस्कार की घुट्टी बचपन से पी थी। आत्मविश्वास से पूर्णतया भरी थी।
ना कभी किसी से उलझी ना उलझने का शौक चर्राया।
माता पिता का मुझ पर बहुत विश्वास था और मैंने कभी उस विश्वास का फायदा नहीं उठाया।

उम्र का तीसरा मोड़ भी आया, यहां भी सब को मैंने अपना ही पाया।
प्यार भरे लोग थे, पति साथी थे, अपनी हर समस्या को मैंने सबको खुलकर बताया और सबसे समाधान भी पाया। मिलजुल कर खूब काम करके हम दोनों ने घर भी बसाया।

उससे अगले खूबसूरत  मोड़ में मिले मुझे प्यारे प्यारे बच्चे थे
सब सपने सच्चे हुए वह बहुत ही अच्छे थे।
उनके प्यार में मैं सब कुछ भूल गई।
उनके साथ में अपना बचपन और जवानी भी फिर से जी गई।

दादी नानी बनकर मेरी उम्र भी संवर गई।
नए नए अनुभवों से जिंदगी भी निखर गई।

आज जब बच्चों ने मुझे वूमेंस डे के बारे में बताया और समझाया
आज के दिन हर महिला को प्रेम और सम्मान देते हैं।
हैरान हो उनसे पूछा  यह तो ठीक है  पर आज ही क्यों? बाकी के दिन महिला के साथ कैसा व्यवहार करते हैं?

अरे मूर्खों,
हम तो हर रूप में पूर्ण और संतुष्ट है, हम् मां भी है बेटी भी है ,बहन भी है ,बहू भी है। हर रूप में हमने प्यार और सम्मान ही पाया है ‌। मिट्टी के मकानों को घर हमने ही तो बनाया है।

हमको किसी आडम्बर नारीवाद या नारे की जरूरत नहीं। तुम केवल अपने घर में प्रत्येक नारी को सम्मान और प्यार करने की अपनी आदत डाल लो।

नारी जाति की रक्षा करने के लिए तुम्हें कुछ और भी करना है यह बात अपने मन से निकाल लो।

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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