
जंग का आगाज़ करना है,बहुत आसान!
खत्म करने में मगर होते हैं पशेमान!
जिस तरह वो लड़ रहा जग देख है हैरान!
देख कर खुद दंग है जो बन रहा था डान!
मध्य का भूगोल सबके चश्म मे छाया हुआ,
बच्चे बच्चे को खबर अब चीज़ क्या ईरान!
फ़ासला रखते बनाये हम जो दोनों ओर से,
है मज़ाल किसी की जो खींच देता कान!
लग रहा है अपनी सारी चाल उल्टी पड़ रही,
उलझनों मे पड़ गए हैं सारे हुकमरान!
क्या भला हासिल हुआ जंग छेड़ कर बतलाइये,
हर तरफ़ से हो रहा नुक्सान ही नुक्सान!
कुछ दिनों गर और डटा रहा गया ईरान,
है ये मुमकिन छोड़कर भागेगा पहलवान!
ले के जाते और पीछे इस जमाने को हैं ‘‘जय”
सिरफिरों के हाथ मे आ जाती जब कमान!
रचना- जय प्रकाश विश्वकर्मा, मुंबई




