
हे जगदम्बे याचक बनकर
हाथ नारियल चुनरी लेकर,
सच्चे मन से आया हूँ।
हे जगदम्बे याचक बनकर
भाव पुष्प मैं लाया हूँ।।
नव रातों का चैत्र महीना,
लौट पुनः फिर आया है।
हे माँ अम्बे पूजा करके,
मन मेरा हरषाया है।।
तन-मन मेरा रमा हुआ है,
माता के जयकारों में।
शक्ति-भक्ति दे दो माँ मुझको,
आया हूँ दरबारों में।।
चमत्कार जो देखा माता,
स्वयं समर्पित पाया हूँ।
हे जगदम्बे याचक बनकर,
तेरे दर पर आया हूँ।।
विनती सुनना दुर्गा माता,
अष्ट भवानी भय हारी।
कालरात्रि हे ब्रह्मचारिणी,
तुम हो माँ मंगलकारी।।
शैल सुता हे मंगलगौरी,
तेरा दर्शन पाया हूँ।
हे जगदम्बे याचक बनकर
तेरे दर पर आया हूँ।।
तेरे दर पर मैं तो माता,
मनोकामना लाया हूंँ।
दर्शन दे दो माता रानी,
निर्मल मन से आया हूँ।
हे जगदम्बे याचक बनकर,
तेरे दर पर आया हूँ।।
डॉ जगदीश नारायण गुप्ता “जगदीश”
बनारस✍️ ✍️




