साहित्य

बिन बुलाए मेहमान… हास्य-व्यंग्य

जयचन्द प्रजापति जय'

मखंचूलाल खाने के बहुत शौकीन थे। शहर में होने वाले शादी समारोह में बिन बुलाये पहुँच जाते और खूब कचर-कचर कर पेट भरकर अर्थात गले तक ठूंस-ठूंस कर खाते। यह सब उनके खाने का शाही अंदाज था।

क्लीन शेव, हेयर डाई के प्रयोग से बाल लहराने वाले रखते। जूता पालिस करके, क्रीम-पाउडर लगाकर और महंगे सुगंधियों का प्रयोग करते। एक शाही अंदाज। कोई देखता तो यह महसूस करता कि दूल्हे का खास रिश्तेदार है। इस प्रकार कोई टोकता नहीं था। मजे से खाकर तोंद पर हाथ फेरते।

कितना बढिया खाना। रायता तो सोने में सुहागा। चटनी तो ऐसी जी करे चाटता रहे। मटर पनीर की सब्जी, मजेदार पूड़ियाँ। दहीबड़ा उपर से खाने को मिलता। रसगुल्ले तो पैक कर जेब मे रख लेते थे। कोई आइटम छोड़ता नहीं।

कितना बढिया खाना। जी भर कर खाया मखंचूलाल। पेट पर हाथ फेरा। मजा आ गया। ईश्वर से प्रार्थना की। इसी तरह से खाने को मिलता रहे तो सवा पाव लड्डू प्रत्येक महीने चढ़ाऊंगा।

आज मखंचूलाल एक जज के यहाँ कार्यक्रम में पहुँच गये। जज ने खाना खाने वाले को एक इनवाइट कार्ड दिया था जिसे खाने पर दिखाना था। जो नहीं दिखाता मान लिया जाता बिना निमंत्रण का आया है।

इस बार मखंचूलाल की नइया डुबती नजर आई और बेचारे पकड़े गये। बिन निमंत्रण के पहुंचे थे। आखिरकार मखंचूलाल पिट गये। किसी ने एक हाथ मारा, किसी ने दो हाथ मार कर संतुष्टी प्राप्त की। बिन बुलाए मेहमान की सारा चटनी, रायता एक ही बार में निकल गया।

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जयचन्द प्रजापति जय’
प्रयागराज

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