
नवसंवत्सर लेकर आया,
नूतन नवल विहान है।
नयी उमंगें नयी तरंगे,
नया-नया परिधान है॥
विक्रम संवत प्रथम दिवस यह,
शुचिता का प्रतिमान है।
यही हमारा नूतन संवत,
सनातनी पहचान है॥
चैत्र शुक्ल का प्रथम दिवस शुभ,
नूतन संवत मान है।
नव संवत्सर लेकर आता,
नवरात्रि पूज्यवान है॥
कलश आरती घर-घर मंगल,
अंबे का शुभगान है।
आओ मिलकर खुशी मनायें,
मंगलमय दिनमान है॥
नव पल्लव तरुवर पर झूमें,
प्रमुदित प्रखर विहान है।
नूतन लतिकाएँ लहरातीं,
जीवन नित गतिमान है॥
वक पिक काक पपीहा बोले,
मादक मौसम भान है।
दूर तलक छाई हरियाली,
हरित खेत खलिहान है॥
ऋतु बसंत की मधुमय बेला,
मधुरिम कलरव गान है।
पीपल की डाली पर बैठी,
कोयल की मृदु तान है॥
नव कलियाँ उपवन में चटकीं,
गुंजन गुंजित राग में।
तितली दौड़ लगाती वन में,
चातक चकित विहाग में॥
प्रथम रूप माँ शैलसुता का,
सुन्दर रूप विशाल है।
सर्वजगत की रक्षा करती,
रखती सब खुशहाल है॥
ड्रम मंजीरा डंका बाजे,
करते सब गुणगान हैं।
माँ चरणों में शीश नवाकर,
माँगें शुभ वरदान हैं॥
© डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




