साहित्य

प्रलयज्योति

जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी "जीत"

जब दिशाओं में अंधकार का साम्राज्य छा जाता है,
जब सत्य का दीप भी डगमगाने लगता है,
जब मनुष्य का विश्वास स्वयं से ही हार जाता है—
तब, हे मां कालरात्रि!
तुम प्रलय की ज्वाला बन प्रकट होती हो।

काली घटाओं-सी घनी तुम्हारी आभा,
जटाओं में लिपटी अग्नि की भाषा,
तीनों लोकों में गूंजती तुम्हारी हुंकार—
जिससे काल भी थर्रा उठे बारंबार।

विकराल रूप में भी करुणा की धारा हो तुम,
संहार में भी सृजन का इशारा हो तुम,
तेरी प्रत्येक दृष्टि में एक गूढ़ रहस्य छिपा है—
कि विनाश के बाद ही नव निर्माण खिला है।

तुम्हारे चरणों में जो भय समर्पित कर देता है,
वह निर्भयता का अमृत स्वयं पी लेता है,
जो तेरी शरण में अपने अश्रु बहा देता है—
उसका हर संकट तुझमें ही खो जाता है।

हे मां!
तेरी ज्वाला से दुष्टों का अभिमान जलता है,
तेरी कृपा से हर भक्त संभलता है,
तू ही रणभूमि की विजय-घोष है,
तू ही जीवन की अंतिम आशा का जोश है।

भानु चक्र में जब तेरा ध्यान उतरता है,
अंतर का हर अंधकार बिखरता है,
मन का हर कोना उजियारे से भर जाता है—
जैसे स्वयं सूर्य भीतर ही उग आता है।

तेरे नाम का स्मरण ही कवच बन जाता है,
हर संकट जैसे स्वयं हट जाता है,
जो तुझे हृदय से पुकारे, सच्चे भाव से—
उसके जीवन का हर मार्ग सरल हो जाता है।

हे शत्रु-विनाशिनी, प्रलय की अधीश्वरी,
तेरे बिना यह सृष्टि अधूरी, अधूरी ही रही,
तू ही भय का अंत, तू ही साहस की जननी—
तेरी कृपा से ही हर आत्मा बने धन्य।

जब जीवन की राहों में घना अंधेरा छा जाए,
जब हर आशा का दीप बुझता सा नजर आए,
तब तेरा स्मरण ही वह प्रकाश बन जाए—
जो टूटे मन को फिर से खड़ा कर जाए।

हे मां कालरात्रि!
मुझे भी वह अडिग विश्वास दे दो,
हर विपदा में मुस्कुराने का प्रकाश दे दो,
तेरे चरणों में ऐसा मन स्थिर हो जाए—
कि हर भय मिटे, और आत्मबल जाग जाए।

~ जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”
युवा लेखक,कवि एवं साहित्यकार
सक्ती, छत्तीसगढ़

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