
भीतर अमृत बाहर मरुस्थल,
कैसी विडम्बना आई है।
नीली बूँदों के बिना तो,
धरती में उदासी छाई है।
घटता पानी तड़पे जीवन,
बस आँखें ही अब नम हैं।
पानी की हर एक बूँद है कहती,
इसके ज़िम्मेदार भी हम हैं।
धुआँ उगलते कल-कारखाने,
ज़हरीली सब नद-नदियाँ हैं।
पानी की हर बूँद पुकारे,
मुझसे ही ये दुनियाँ है।
आओ मिलकर सब करें जतन,
पानी की हर बूँद सहेजें।
आने वाले कल को जल देकर,
जीवन की खुशहाली भेजें।
श्रीमती लक्ष्मी चौहान ‘रोशनी’
कोटद्वार, उत्तराखंड




